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________________ श्री जिनदत्तसूरिजी के चित्रों में प्राचीनतम अथवा न आवे। चित्र के मध्य रूंड में दोनों ओर बोर्ड तथा मध्य दूसरे शब्दों में कहा जाय तो इस शैली की प्राचीन काष्ठ- में फूल बनाया है जिसके बीच में छिद्र है जो ताडपत्रीय पट्टिका का चित्र जो यहां प्रकाशित किया जा रहा है, नथ को डोरी पिरोकर बांधने में काम आता था । श्री जिनदत्तसूरि के आचार्य पद प्राप्ति के पूर्व का है। चित्र के दूसरे रूण्ड में साध्वियों का उपाश्रय है । पट्ट यह फलक चित्र हमारे ''सेठ शंकरदान नाहटा कलाभवन" पर प्रवत्तिनी विमलमति बैठी हुई हैं जिनके पृष्ठ भाग में भी में सुरक्षित है। पीठफलक सुशोभित है । सामने दो साध्वियाँ बैठी हुई हैं ___ यह काष्ठपट्टिका ३४११६ इच की है। इसके चारों जिनके नाम 'नय श्री साध्वी' और 'नयमतिम्' लिखा हुआ ओर बोर्डर है। इस चित्र के तीन खंड हैं। प्रथम खंड है। तीनों के बीच में स्थापनाचार्यजी रखे हुए हैं, साध्वीजी में आचार्य श्रीगुणसमुद्र और सामने ही आसन पर सोम- के पीछे एक श्राविका आसन पर बैठी हुई है जिसपर उसका चन्द्रगणि ! श्रीजिनदत्तसूरि ) बेटे हुए हैं। आचार्यश्री के नाम नंदीसीर (विका) लिखा हुआ है। चित्रफलक का पृष्ठ भाग में पीठ-फलक है और श्री सोमचन्द्रगणि के नहीं किनारा टूट जाने से जोड़ा हुआ है। है इससे उनका दीक्षापर्याय में बड़ा होना प्रमाणित है। इस सचित्र काष्ठपट्टिका का समय-इसमें श्रीजिनदत्त. दोनों के मध्य में स्थापनाचार्य जी हैं. दोनों के पास रजोहरण सरिजी के दीक्षानाम लिखा हुआ होने से सं० ११६६ के है, दोनों एक गोडा ऊंचा और एक गोडा नीचा किये हुए पूर्व का तो है ही। इसमें आये हुए साधु-सावियों के नाम प्रवचनमुद्रा में आमने सामने बैठे हैं। दोनों के श्वेत "गणधरसाद्धशतक वृहद्वृत्ति" में नहीं मिलते अत: आचार्य वस्त्र हैं। पद प्राप्ति से पूर्व श्रीजिनदत्तसूरि जी के आज्ञानुवर्तिनी जो आचार्य श्री के पीछे एक श्रावक बैठा है जिसकी धोती साध्वियाँ थीं, उनका नाम प्राप्त होना ऐतिहासिक दृष्टि से जांघिये की भांति है। कंधे पर उत्तरीय वस्त्र के अतिरिक्त भी महत्वपूर्ण है। हमारी राय में इस काष्ठपट्टिका का कोई वस्त्र नहीं है जो उस समय के अल्पवस्त्र-परिधान को समय सं० ११५० के आस-पास का है । सूचित करता है। शावक के गले में स्वर्णहार है और अप्रकाशित महत्वपूर्ण काष्ठफलक एक गोडा ऊंचा करके करबद्ध बैठा है, उसके पृष्ठ भाग में जेसलमेर के श्रीजिनभद्रसूरि ज्ञानभंडार में जो श्रीजिनदो श्राविकाएं भी इसी मुद्रा में हैं, जिनके गले में हार व दत्तसूरि जी और नरपति कुमारपाल की महत्वपूर्ण सचित्र हाथों में चूड़ियाँ और कानों में बड़े-बड़े कर्णफूल है। वस्त्र काष्ठपट्टिका थी, वह अभी थाहरूसाह के भंडार में रखी सबके रंगीन और छींटकी भाँति है, केशपाश का जूड़ा बांधा हुई है। उसे देखकर हमने जो संक्षिप्त विवरण नोट किया हुआ है। श्रावक के मरोड़ी हुई पतली मूछ और ठोड़ी था उसे यहाँ दिया जा रहा हैके भाग को छोड़कर अल्प दाढ़ी है। श्रावक के खुले इस चित्र पट्टिका पर '९ नरपति कुमारपाल भक्तिमस्तक पर घने बालों का गिर्दा है। रस्तु" लिखा हुआ है। इस फलक के मध्य में नवफणा __सोमचन्द्रगणि के पृष्ठ भाग में दो व्यक्ति बैठे हैं जिनकी पार्श्वनाथ का जिनालय है जिसकी सपरिकर प्रतिमा के वेषभूषा भी उपर्युक्त श्रावकों के सदृश ही है। चित्र शैली उभयपक्ष में गजारुढ़ इन्द्र और दोनों ओर चामरधारी में तत्कालीन प्रथानुसार नेत्र की तीखी रेखाए' और दोनों अवस्थित हैं। दाहिनी ओर दो शंखधारी पुरुष खड़े हैं। आँख इसलिए दिखायी है कि चित्र में एकाक्षीपन का दोष भगवान् के बायें कक्ष में पुष्प-चंगेरी लिए हुए भक्त खड़े हैं, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211159
Book TitleDada Guruo ke Prachin Chitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhanvarlal Nahta
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Art
File Size2 MB
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