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________________ 6-0-0-0--------------- गोपीलाल अमर : दर्शन और विज्ञान के आलोक में पुद्गल द्रव्य : ३७७ (ग) अणु में कोई एक रस, एक गन्ध, एक वर्ण और दो स्पर्श (स्निग्ध अथवा रूक्ष और शीत अथवा उष्ण) होते हैं.' (घ) अणु के अस्तित्व का ज्ञान (अनुमान) उससे निर्मित पुद्गल-स्कन्धरूप कार्य से होता है. (ङ) अणु इतना सूक्ष्म होता है कि उसके आदि, मध्य और अन्त का प्रश्न ही नहीं उठता.२ अणु और विज्ञान का तथाकथित 'एटम'—इन सभी विशेषताओं के बावजूद यह ध्यान देने की बात है कि आधुनिक रसायन-शास्त्र (Chemistry) में जो 'एटम' (Atoms) माने गये हैं, उन्हें प्रस्तुत अणु का ही दूसरा रूप नहीं कहा जा सकता. यद्यपि 'एटम' का मतलब पहले यही लिया गया था कि उसे विभाजित नहीं किया जा सकता लेकिन अब यह प्रमाणित हो चुका है कि 'एटम' (Atom) उद्युत्कण (Proton), निद्युत्कण (Neutrons) और विद्युत्कण (Electron) का एक पिण्ड है जबकि परमाणु वह मूल कण है जो दूसरों से मेल के बिना स्वयं कायम रहता है. अणु और 'एटम' की इस विषमता को देखकर वैशेषिक दर्शन की यह मान्यता और भी हास्यास्पद लगने लगती है कि सूर्य के प्रकाश में चलते-फिरते दिखने वाले धूलिकण परमारणु हैं. अणु का वर्गीकरण अणु को चार वर्गों में रखा जा सकता है :(१) द्रव्य अणु अर्थात् पुद्गल-परमाणु, (२) क्षेत्र अणु अर्थात् आकाश-प्रदेश, (३) काल अणु अर्थात् 'समय' (४) भाव अणु अर्थात् 'गुण'. भाव अणु के भी चार मूल भेद और सोलह उपभेद होते हैं. स्कन्ध स्कन्ध की परिभाषा-दो या दो से अधिक परमाणुओं को पिण्ड स्कन्ध कहलाता है. स्कन्ध का घनत्व-यह आवश्यक नहीं कि सभी स्कन्ध नेत्र द्वारा लक्षित हो सकें. एक स्कन्ध में भी, जिसे हम सूक्ष्मदर्शक यंत्र से ही देख पाते हों—अनन्त परमाणु रहते हैं. जैनदर्शन का यह स्कन्धों के घनत्व का सिद्धान्त विज्ञान द्वारा खूब पुष्ट हुआ है. एक औंस पानी में इतने स्कन्ध हैं कि यदि उन्हें संसार के तमाम स्त्री-पुरुष और बच्चे प्रति सेकण्ड पाँच की रफ्तार से गिनना शुरू कर दें तो पूरा गिनने में चालीस अरब वर्ष का समय लग जावेगा.६ अभी-अभी सौरमण्डल में एक ऐसे नक्षत्र का पता चला है जिसके एक घन इंच का अंश ६२० टन (१७३६० मन) के वजन का होता है." स्कन्ध का वर्गीकरण स्कन्धों को तीन वर्गों में रखा जाता है.5 'स्कन्ध' अनेक परमाणु जब एक समुदाय में आकर १. एक-रस-गन्ध-वणों द्विस्पर्शः कार्यलिंगश्च. कारणमेव तदन्त्यं, सूक्ष्मो नित्यो भवेत् परमाणुः । आचार्य अकलंकदेवः तत्त्वार्थराजवार्तिक, अ० २, सू० २५. २. सीचम्याद् य आत्मादि-रात्ममध्य-आत्मान्तश्च । -वही, अ०५, सू० २५, वा०१. ३. चउब्धिहे परमारः पराणत्ते, तं जहा, दवपरमार, खेत्तपरमारा, कालपरमाणू , भावपरमाए। -भगवतीसूत्र, २० | ५ | १२. ४. वही, २० ।५ । १६. ५. वही, २०। ५ । १. &. E. N. D. Sc.&. Andrade D. Sc. Ph. D. The Machanism of Nature Page 37. ७. Raby fa Bois F. R. A. 'Arm Chair Science' London, July 1937. ८. जे रूबी ते चउचिहा पराणत्ता, खंधा, खंधदेसा, खंधपएसा, परमागुपोग्गला -भगवती सुत्र, २।१०। ६६. स उपwwwwww wwwwww 10101010101010 Isiolo i otoll ololololololol प्पा Jain Education internam For Private & Personal use only wawwajanenorary.org
SR No.211150
Book TitleDarshan aur Vigyan ke Alok me Pudgal Dravya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGopilal Amar
PublisherZ_Hajarimalmuni_Smruti_Granth_012040.pdf
Publication Year1965
Total Pages21
LanguageHindi
ClassificationArticle & Six Substances
File Size2 MB
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