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________________ दक्षिण में जन-आयुर्वेद (प्राणावाय) की परम्परा तीर्थकरों की वाणी का संग्रह-संकलन कर जैन आगमों की रचना की गई। इनके १२ भाग हैं, जिन्हें 'द्वादशांग' कहते हैं। इन बारह अंगों में अंतिम भाग 'दृष्टिवाद' कहलाता है। डॉ० राजेन्द्र प्रकाश भटनागर 'दृष्टिवाद' के पांच भेद हैं-१ पूर्वगत २ सुष, ३ प्रथमानुयोग, ४ परिकर्म, और ५ चूलिका 'पूर्व' चौदह हैं। इनमें से बारहवें 'पूर्व' का नाम 'प्राणावाय' है इस 'पूर्व' में मनुष्य के आभ्यन्तर अर्थात् मानसिक और आध्यात्मिक तथा बाह्य अर्थात् शारीरिक स्वास्थ्य के उपायों, जैसे – यम, नियम, आहार, विहार और औषधियों का विवेचन है। साथ ही, इसमें दैविक, भौतिक, आधिभौतिक, जनपदोध्वंसी रोगों की चिकित्सा का विचार किया गया है। दिगम्बर आचार्य अकलंकदेव (व शती) के तत्वार्थवातिक' (राजवातिक) में प्राणावाय' की परिभाषा बताते हुए कहा गया है—'कायचिकित्साद्यष्टांग आयुर्वेदः भूतिकर्म जांगुनिप्रक्रमः प्राणापान विभागोऽपि यत्र विस्तरेण वर्णितस्तत् प्राणावायम् ।" ( ० १ सू०२० ) - जिसमें कार्याचकित्सा आदि आठ अंगों के रूप में संपूर्ण आयुर्वेद, भूतशांति के उपाय, विवचिकित्सा और प्राण अपान आदि वायुओं के शरीर धारण की दृष्टि से विभाग ( योगक्रियाएं) का प्रतिपादन किया गया है, उसे 'प्राणवाय' कहते हैं । उमादित्य कृत 'कल्याणकारक' दक्षिण के जैनाचार्यों द्वारा रचित 'आयुर्वेद' या 'प्राणावाय' के उपलब्ध ग्रन्थों में उग्रादित्य का 'कल्याणकारक' सबसे प्राचीन, मुख्य और महत्वपूर्ण है ।' प्राणावाय की प्राचीन जैन- परम्परा का दिग्दर्शन हमें एकमात्र इसी ग्रन्थ से प्राप्त होता है। यही नहीं, इसका अन्य दृष्टि से भी बहुत महत्व है। ईसवी ८वीं शताब्दी में प्रचलित चिकित्सा प्रयोगों और रसौषधियों से भिन्न और सर्वथा नवीन प्रयोग हमें इस ग्रन्थ में देखने को मिलते हैं । सबसे पहले १९२२ में नरसिंहाचार्य ने अपनी पुरातत्व संबंधी रिपोर्ट में इस ग्रन्थ के महत्व और विषयवस्तु के वैशिष्ट्य पर निम्नांकित पंक्तियों में प्रकाश डाला था, तब से अब तक इस पर पर्याप्त ऊहापोह किया गया है । "Another manuscript of some intest is the medical work 'KALYNAKARAKA of Ugraditya, a Jaina author, who was a contemporary of the Rastrakuta king Amoghavarsha I and of the Eastern Chalukya king kali Vishnuvardhan V. The work opens with the statement that the science of Medicine is divided into two parts, namely prevention and cure, and gives at the end a long discourse in Sanskrit prose on the uselessness of a flesh diet, said to have been delivered by the author at the court of Amoghvarsha, where many learned men and doctors had assembled." (Mysore Archaeological Report, 1922, page 23) अर्थात् —'अन्य महत्वपूर्ण हस्तलिखित ग्रन्थ, उग्रादित्य का चिकित्साशास्त्र पर 'कल्याणकारक' नामक रचना है। यह विद्वान जैन लेखक और राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष प्रथम तथा पूर्वी चालुक्य राजा कली विष्णुवर्धन पंचम का समकालीन था पंथ के प्रारंभ में कहा गया है कि चिकित्साविज्ञान दो भागों में बंटा हुआ है-जिनके नाम है 'प्रतिबंधक चिकित्सा' और 'प्रतिकारात्मक चिकित्सा'। तथा, इस ग्रंथ के अंत में संस्कृत गद्य में मांसाहार की निरर्थकता संबंध में विस्तृत संभाषण दिया गया है, जो बताया जाता है कि अमोघवर्ष की राजसभा में लेखक ने प्रस्तुत किया था, जहां पर अनेक विद्वान और चिकित्सक एकत्रित थे । १. 'कल्याणकारक' ग्रंथ का प्रकाशन सोलापुर से सेठ गोविंदजी रावजी दोशी ने सन् १९४० में किया है। इसमें मूल संस्कृत पाठ के प्रतिरिक्त पं० बद्धं मान पार्श्वनाथ शास्त्री कृत हिन्दी मनुवाद भी प्रकाशित किया गया है। इसके संपादन हेतु चार हस्तनिचित प्रतियों की सहायता ली गयी है । जैन प्राच्य विधाएं Jain Education International For Private & Personal Use Only १८३ www.jainelibrary.org
SR No.211149
Book TitleDakshin me Jain Ayurved ki Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajendraprasad Bhatnagar
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages14
LanguageHindi
ClassificationArticle & Medicine
File Size2 MB
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