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________________ ३३४ कर्मयोगी श्री केसरीमलजो सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड बृहद्वत्ति समालोक्य भैक्षुशब्दानुशासनीम् । शीघ्रोपकारिणी श्रेष्ठा लघ्वीवृत्तिविरच्यते ।। इसमें भिक्षुशब्दानुशासन के उलझन भरे सूत्रगत रहस्यों को छोड़कर सामान्य रहस्यों को खोला गया है, इसलिए साधारण विद्यार्थी इसके माध्यम से भिक्षुशब्दानुशासन का अध्ययन करने में सफल हो सकते हैं। इसका रचनाकाल वि०सं० १६६५ है। तुलसीप्रभाप्रक्रिया वि० सं० १९६६ में मुनि श्री सोहनलालजी (चूरू) ने 'तुलसीप्रभा प्रक्रिया' नामक व्याकरण तैयार किया। इस व्याकरण का आधार सिद्धहेमशब्दानुशासन है। व्याकरण और न्याय के जितने ग्रन्थ हैं वे सब पूर्वरचित ग्रन्थों के आधार पर ही बनाए गए हैं इसलिए इनमें कई स्थलों पर एकरूपता प्राप्त होती है। एकरूपता होने पर भी ग्रन्थ में जो नयापन होता है, वह ग्रन्थ कार का अपना होता है। इस दृष्टि से प्रत्येक ग्रन्थ का स्वतन्त्र महत्त्व है। प्रस्तुत ग्रन्थ 'तुलसीप्रभाप्रक्रिया' में प्राचीन उदाहरणों को नए रूप में परिवर्तित किया गया है। संज्ञाएँ प्राचीन ही हैं, फिर भी उदाहरणों की नवीनता ने इस ग्रन्थ को पठनीय बना दिया है। श्रीभिक्षुन्यायदर्पण व्याकरण के सूत्र अपने आप में पूर्ण होने पर भी अपूर्ण रहते हैं । अनेक सूत्रों के हितों में परस्पर संघर्ष खड़ा हो जाता है । ऐसी स्थिति में पाठक के सामने समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। पाठकों की समस्या समाहित करने के लिए व्याकरण के साथ कुछ न्याय सूत्रों का होना आवश्यक है। जहाँ-जहाँ सूत्रों में संघर्ष पैदा होता है न्याय के आधार पर उसे उपशान्त किया जाता है । भिक्षुशब्दानुशासन की उलझनों को समाधान देने के लिए 'श्रीभिक्षुन्यायदर्पण' का निर्माण हुआ । न्याय की परिभाषा देते हुए ग्रन्थकार ने लिखा है नीयते संदिग्धोऽर्थो निर्णयमेभिरिति न्यायाः सन्दिग्ध अर्थ को निर्णय देने वाले सूत्रों का नाम न्याय है । न्यायदर्पण में १३५ सूत्र हैं। इन सूत्रों का सम्बन्ध मूलतः व्याकरण से है फिर भी ये बहुत व्यावहारिक हैं । व्यावहारिकता के कारण इनका विषय वर्णन रोचकता लिए हुए है। भिक्षुलिंगानुशासन “लिंगानुशासनमन्तरेण शब्दानुशासनं अविकलम्"-लिंगानुशासन के बिना शब्दानुशासन अधूरा रहता है। क्योंकि शब्दानुशासन का काम है शब्दों की सिद्धि । प्रकृति-प्रत्यय से निष्पन्न शब्दों की जानकारी होने पर भी लिंग ज्ञान के अभाव में उनका प्रयोग नहीं हो सकता। लिंगज्ञान के लिए विद्यार्थियों को लिंगानुशासन की अपेक्षा रहती है। पण्डित रघुनन्दनजी ने आचार्य भिक्षु के नाम पर श्रीभिक्षुलिंगानुशासन की रचना की। मुनिश्री चन्दनमलजी ने लिंगानुशासन की वृत्ति बनाकर इसे सुबोध बना दिया। लिंगानुशासन पद्यबद्ध रचना है। इसके श्लोकों की संख्या १५७ है। श्रीभिक्षूणादि वृत्ति उणादि पाठ व्याकरण का एक विशेष स्थल है । उसका प्रारम्भ 'उणु' प्रत्यय से होता है, इसलिए इसे उणादि कहते हैं । उणादि प्रत्ययों के द्वारा शब्दों की सिद्धि में बहुत सुगमता रहती है। जो शब्द बनाना है, उसके अनुरूप धातु और प्रत्यय में सम्बन्ध स्थापित कर नए-नए सूत्र बनाए हैं। एक-एक शब्द के लिए सूत्र रचना की गई है । यह Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211144
Book TitleTerapanthi Jain Vyakaran Sahitya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakprabhashreeji
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages12
LanguageHindi
ClassificationArticle & Grammar
File Size470 KB
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