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________________ (चतुस्पर्शी) या सप्तगुणी (अष्टस्पर्शी) पणओंकी समानता और अनंतताका सही व्याख्यान नहीं होता । यदि आगमोक्त परमाणुओंको इलेक्ट्रान, पोजिट्रानके समकक्ष भी माना जाय, तो भी प्रोटान या न्यट्रानके निर्माणको एक तीसरे पर पर्याप्त भारी मूलकणी परमाणुको माने बिना नहीं समझाया जा सकता। इ प्रकार आगमोक्त परमाण शब्दसे कमसे कम तीन विभिन्न प्रकारके कणोंका बोध होता है जो एक दूसरेसे भिन्न होते हैं । तीन कण परमाणुओंकी जातिगत अनन्तताको सिद्ध नहीं करते । (३) तत्त्वार्थसूत्रमें परमाणुओंकी बंधप्रक्रियाके तीन मुख्य सूत्र दिये हैं। जैन ने अपनी व्याख्यामें बताया है कि आगमोक्त परमाणुओंको यदि इलेक्ट्रान आदिके समकक्ष माना जाता है, तो उनकी सही व्याख्या नहीं की जा सकती। फिर भी, वे परमाणकी अविभागिताको मूल मानते हये इस समरूपता पर ही बल देते हैं। इसके विपर्यासमें, यदि आगमोक्त परमाणुको वर्तमान परमाणुके समकक्ष माना जाय, तो यह प्रक्रिया सहजमें समझी जा सकती है। इसके उन्होंने अनेक उदाहरण दिये हैं। ____ आगमोक्त परमाणुओंको वर्तमान परमाणुओंके समकक्ष मानने पर उनके खोखलेपन, संकोचविस्तार, विविधता तथा बन्धप्रक्रियाकी न केवल सरलता वहीं प्रकट होती है, अपितु यह भी अचरज होता है कि उपकरण-विहीन पुरातन युगमें भी हमारे जैन मनीषी कितने गंभीर एवं तीक्ष्ण विचारक रहे हैं । यही नहीं, आगमोंमें अनेक स्थलों पर परमाणुओंके सम्बन्धमें परिमाणात्मक विवरण प्राप्त होते हैं, वे भी आगमोक्त परमाणुओंकी इस समकक्षताको पुष्ट करते हैं। उदाहरणार्थ तिलोयपण्णत्तिमें लम्बाईके यूनिटोंकी चर्चा करते हुये उवसन्नासन्नसे लेकर यव और अंगुल यूनिटोंके मान बताये हैं । दत्त और सिहके अनुसार अंगुलका मान यदि ०-७७ इंच या १-६५ सेमी० माना जाय, तो उवसन्नासन्न यूनिटका परिमाण १०-११सेमी० आता है । इस आधार पर अनुयोगद्वार और जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिके व्यावहारिक परमाणु का मान ०.८x१०८ सेमी० होगा जो आधुनिक सामान्य परमाणुके व्यासके बराबर ही है। इलेक्ट्रान या न्यूक्लिसका व्यास १०-१३ सेमी० के लगभग होता है। यहाँ भी यह ध्यानमें रखना चाहिये कि विभिन्न ग्रन्थों में क्षेत्रमानोंकी यनिटोंमें कुछ अन्तर भी पाया गया है। इस साइजके अतिरिक्त, परमाणओंकी गति, स्पर्श, प्रतिघात, कम्पन आदिके सम्बन्धित विवरण भी वर्तमान परमाणुकी समकक्षतामें घटित हो जाते हैं । जवेरी और अन्य लेखकोंने आगमोक्त परमाणुओंको द्रव्यमान या संहतिविहीन कणोंके समकक्ष माननेका सुझाव दिया है। लेकिन अबतक संहतिविहीन कण ऊर्जाएँ ही रही हैं और आईस्टीनने ऊर्जाओंकी कणमयता प्रमाणित की है । क्वान्टम सिद्धान्त भी इसकी पुष्टि करता है कि सभी ऊर्जाओं एवं सूक्ष्मकणोंके व्यवहार तरंगणी प्रकृतिके आधार पर ही समझाये जा सकते हैं। इस प्रकार, आगमोक्त परमाणु पदसे वाच्य अर्थमें समीक्षक काफी खींचतान करते प्रतीत होते हैं। वस्तुतः अविभागी, अगुरुलघु और इन्द्रिय-अग्राह्य पदको बहुत अधिक पूर्वाग्रहपूर्वक नहीं लेना चाहिये । हाँ, यह अवश्य स्वीकार करना होगा कि परमाणुको सूक्ष्म और व्यावहारिक परमाणुके रूपमें मान्यता प्रदान कर संभवतः पद्मनंदिने उसी प्रकार शास्त्रीय मर्यादा स्थिर रखी जैसे भट्ट अकलंकने प्रत्यक्ष ज्ञानको लौकिक और मुख्य प्रत्यक्षके रूपसे विभाजित कर अपने समयमें एक बड़े विवादको चतुरतापूर्वक सुलझाया था। वस्तुतः सामान्य जन न तो मुख्य प्रत्यक्षमें रुचि रखता है और न ही सक्ष्म परमाणमें । उनकी परिभाषा शास्त्रीय और अकल्पनीय भी बनी रहे, तो कोई आपत्ति नहीं है। इस प्रकार यह कहना चाहिये कि आधुनिक वैज्ञानिक परमाणु आगमोक्त व्यावहारिक परमाणुके समकक्ष होता है । अतः इनके अन्य गुणोंका वर्णन भी इसी आधार पर समीक्षित किया जाना चाहिये । सिकदर और जैनने आगमोक्त परमाणुवादकी अन्य भारतीय तथा प्राचीन परमाणुवादसे तुलना कर यह प्रमाणित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211040
Book TitleJain Vidyao me Shodh ke Kshitij Ek Sarvekshan Rasayan aur Bhautik
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNandlal Jain
PublisherZ_Kailashchandra_Shastri_Abhinandan_Granth_012048.pdf
Publication Year1980
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Science
File Size920 KB
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