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________________ जैनदर्शन में सत् का स्वरूप जैन आगम साहित्य की व्याख्या एवं उनमें वर्णित विषय- द्रव्यानुयोग है। वस्तु को मुख्य रूप से जिन चार विभागों में वर्गीकृत किया गया है, वे विश्व के सन्दर्भ में जैनों का दृष्टिकोण यह है कि यह विश्व अनुयोग कहे जाते हैं। अनुयोग चार हैं- (१) द्रव्यानुयोग, (२) अकृत्रिम है ('लोगो अकिट्टिमो खलु' मूलाचार, गाथा ७/२)। इस लोक गणितानुयोग, (३) चरणकरणानुयोग और (४) धर्मकथानुयोग। इन का कोई निर्माता या सृष्टिकर्ता नहीं है। अर्ध-मागधी आगम साहित्य में चार अनुयोगों में से जिस अनुयोग के अन्तर्गत विश्व के मूलभूत घटकों भी लोक को शाश्वत बताया गया है। उसमें कहा गया है कि यह लोक के स्वरूप के सम्बध में विवेचन किया जाता है,उसे द्रव्यानुयोग कहते अनादिकाल से है और रहेगा। ऋषिभाषित के अनुसार लोक की हैं। खगोल-भूगोल सम्बन्धी विवरण गणितानुयोग के अन्तर्गत आते हैं। शाश्वतता के इस सिद्वान्त का प्रतिपादन भगवान् पार्श्वनाथ ने किया था। धर्म और सदाचरण संबंधी विधि-निषेधों का विवेचन चरणकरणानुयोग आगे चलकर भगवतीसूत्र में महावीर ने भी इसी सिद्वान्त का अनुमोदन अंतर्गत होता है और धर्म एवं नैतिकता में आस्था को दृढ़ करने हेतु किया।२ जैन दर्शन लोक को जो अकृत्रिम और शाश्वत मानता है उसका सदाचारी, सतपुरुषों के जो आख्यानक (कथानक) प्रस्तुत किये जाते तात्पर्य यह है कि लोक का कोई रचयिता एवं नियामक नहीं है, वह हैं, वे धर्मकथानुयोग के अन्तर्गत आते हैं। स्वाभाविक है और अनादिकाल से चला आ रहा है, किन्तु जैनागमों में इस प्रकार हम देखते हैं कि इन चार अनुयोगों में भी लोक के शाश्वत कहने का तात्पर्य कथमपि यह नहीं है कि उसमें कोई द्रव्यानुयोग का सम्बन्ध तात्त्विक या दार्शनिक चिन्तन से है। जहाँ तक परिवर्तन नहीं होता है। विश्व के सन्दर्भ में जैन चिन्तक जिस नित्यता हमारे दार्शनिक चिन्तन का प्रश्न है आज हम उसे तीन भागों में को स्वीकार करते हैं, वह नित्यता कूटस्थ नित्यता नहीं, परिणामी विभाजित करते हैं- १. तत्त्व-मीमांसा, २. ज्ञान-मीमांसा और ३. नित्यता है, अर्थात् वे विश्व को परिवर्तनशील मानकर भी मात्र प्रवाह या आचार-मीमांसा। इन तीनों में से तत्त्व-मीमांसा एवं ज्ञान-मीमांसा दोनों प्रक्रिया की अपेक्षा से नित्य या शाश्वत कहते हैं। ही द्रव्यानुयोग के अन्तर्गत आते हैं। इनमें भी जहाँ तक तत्त्व-मीमांसा भगवतीसूत्र में लोक के स्वरूप की चर्चा करते हुए लोक को का सम्बन्ध है, उसके प्रमुख कार्य जगत् के मूलभूत घटकों, उपादानों पंचास्तिकाय रूप कहा गया है।३ जैन दर्शन में इस विश्व के मूलभूत या पदार्थों और उनके कार्यों की विवेचना करना है। तत्त्व-मीमांसा का उपादान पाँच अस्तिकाय द्रव्य हैं-१. जीव (चेतन तत्त्व), २. पुद्गल आरम्भ तभी हुआ होगा जब मानव में जगत् के स्वरूप और उसके (भौतिक तत्त्व), ३. धर्म (गति का नियामक तत्त्व), ४. अधर्म (स्थिति मूलभूत उपादान घटकों को जानने की जिज्ञासा प्रस्फुटित हुई होगी नियामक तत्त्व) और ५. आकाश (स्थान या अवकाश देने वाला तथा उसने अपने और अपने परिवेश के संदर्भ में चिन्तन किया होगा। तत्त्व)। इसी चिन्तन के द्वारा तत्त्व-मीमांसा का प्रादुर्भाव हुआ होगा। "मैं कौन ज्ञातव्य है कि यहाँ काल को स्वतन्त्र तत्त्व नहीं माना गया है। हैं", "कहाँ से आया हूँ" “यह जगत् क्या है", जिससे यह निर्मित यद्यपि परवर्ती जैन विचारकों ने काल को भी विश्व के परिवर्तन के हुआ है, वे मूलभूत उपादान,घटक क्या हैं", "यह किन नियमों से मौलिक कारण के रूप में या विश्व में होने वाले परिवर्तनों के नियामक नियंत्रित एवं संचालित होता है" इन्हीं प्रश्नों के समाधान हेतु ही तत्त्व के रूप में स्वतन्त्र द्रव्य माना है। इसकी विस्तृत चर्चा आगे विभिन्न दर्शनों का और उनके तत्त्व-विषयक गवेषणाओं का जन्म हुआ। पंचास्तिकायों और षद्रव्यों के प्रसंग में की जायेगी। यहाँ हमारा जैन परम्परा में भी उसके प्रथम एवं प्राचीनतम आगम ग्रंथ आचारांग का प्रतिपाद्य तो यह है कि जैन दार्शनिक विश्व के मूलभूत उपादानों के रूप प्रारम्भ भी इसी चिन्तना से होता है कि "मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, में पंचास्तिकायों एवं षद्रव्यों की चर्चा करते हैं। विश्व के इन मूलभूत इस शरीर का परित्याग करने पर कहाँ जाऊँगा।"१ वस्तुत: ये ही ऐसे उपादानों को द्रव्य अथवा सत् के रूप में विवेचित किया जाता है। द्रव्य प्रश्न हैं जिनसे दार्शनिक चिन्तन का विकास होता है और तत्त्व- अथवा सत् वह है जो अपने आप में परिपूर्ण, स्वतन्त्र और विश्व का मीमांसा का आविर्भाव होता है। मौलिक घटक है। जैन परम्परा में सामान्यतया सत्, तत्त्व, परमार्थ, तत्त्व-मीमांसा वस्तुत: विश्व-व्याख्या का एक प्रयास है। इसमें द्रव्य, स्वभाव, पर-अपर ध्येय, शुद्ध और परम इन सभी को एकार्थक जगत् के मूलभूत उपादानों तथा उनके कार्यों का विवेचन विभिन्न या पर्यायवाची माना गया है। बृहद्नयचक्र में कहा गया हैदृष्टिकोणों से किया जाता है। विश्व के मूलभूत घटक जो अपने ततं तह परमटुं दव्यसहायं तहेव परमपरं। अस्तित्व के लिये किसी अन्य घटक पर आश्रित नहीं है तथा जो कभी धेयं सुद्धं परमं एयट्ठा हुंति अभिहाणा ।। भी अपने स्व-स्वरूप का परित्याग नहीं करते हैं वे सत् या द्रव्य -बृहद्नयचक्र, ४११ कहलाते हैं। विश्व के तात्त्विक आधार या मूलभूत उपादान ही सत् या जैनागमों में विश्व के मूलभूत घटक के लिए अस्तिकाय, द्रव्य कहे जाते हैं और जो इन द्रव्यों का विवेचन करता है वही तत्त्व और द्रव्य शब्दों का प्रयोग मिलता हैं। उत्तराध्ययनसूत्र में हमें तत्त्व Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210983
Book TitleJaindarshan me Sat ka Swarup
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Philosophy
File Size660 KB
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