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________________ . २७४ श्री पुष्करमुनि अभिनन्दन ग्रन्थ : चतुर्थ खण्ड आवश्यकनियुक्ति में कहा गया है कि जितने अक्षर हैं और उनके जितने संयोग हैं उतने ही श्रु तज्ञान के भेद हैं और इन सारे भेदों को गिनाना सम्भव नहीं है । इसलिए मुख्यरूप से श्र तज्ञान के चौदह भेद हैं (१) अक्षर, (२) संज्ञी, (३) सम्यक्, (४) सादिक, (५) सपर्यवसित, (६) गमिक, (७) अंगप्रविष्ट, (८) अनक्षर, (९) असंशी, (१०) असम्यक्, (११) अनादिक, (१२) अपर्यवसित (१३) अगमिक और (१४) अंगबाह्य" । नन्दीसूत्र में इन चौदह भेदों का विस्तृत स्वरूप बतलाया गया है।" अकलंकदेव २ ने अपने प्रमाणसंग्रह नामक ग्रन्थ में श्रुतज्ञान के तीन भेद किये हैं-(१) प्रत्यक्षनिमित्तक, (२) अनुमाननिमित्तक, और (३) आगमनिमित्तक । किन्तु जैनतर्कवातिककार अकलंक द्वारा बताये श्रुत के तीन भेदों में से अनुमाननिमित्तक और आगमनिमित्तक ये दो ही भेद मानते हैं। अमृतचन्द्रसूरि और नरेन्द्रसेनाचार्य ने विस्तार की अपेक्षा पर्याय आदि के भेद से श्रु तज्ञान के बीस भेद किये हैं। और नेमिचन्द्रसिद्धान्तिक चक्रवर्ती ने भी अपने गोम्मटसार के जीवकाण्ड में श्रु तज्ञान के बीस भेदों का उल्लेख किया है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-(१) पर्याय, (२) पर्यायसमास, (३) अक्षर, (४) अक्षरसमास, (५) पद, (६) पदसमास, (७) संघात, (८) संघातसमास, (९) प्रतिपत्तिक, (१०) प्रतिपत्तिकसमास, (११) अनुयोग, (१२) अनुयोगसमास, (१३) प्रामृतप्रामृत, (१४) प्राभृत प्राभृत-समास, (१५) प्राभृत, (१६) प्राभृतसमास, (१७) वस्तु, (१८) वस्तुसमास, (१६) पूर्व और (२०) पूर्वसमास। इनका स्वरूप जैनाचार्यों ने अपने-अपने ढंग से बतलाया है किन्तु इनके स्वरूप के विषय में परस्पर कोई मौलिक अन्तर नहीं । ये श्रु तज्ञान के बीस भेद दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों ही परम्पराओं को मान्य है, क्योंकि इन बीस भेदों का उल्लेख दोनों परम्पराओं के कर्म-साहित्य में मिलता है। श्र तज्ञान पांचों इन्द्रिय और मन से ज्ञात विषय का ही आलम्बन लेकर व्यापार करता है । इसलिये श्रुतज्ञान के अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक रूप से भी दो भेद गोम्मटसार में किये गये हैं। गोम्मटसार के अनुसार अनक्षरात्मक और अक्षरात्मक श्र तज्ञान का स्वरूप इस प्रकार है (१) श्रोत्र न्द्रिय के अतिरिक्त शेष चार इन्द्रियों में से किसी भी इन्द्रिय और मन की सहायता से होने वाले मतिज्ञानपूर्वक श्रु तज्ञान को अनक्षरात्मक श्रु तज्ञान कहते हैं । और इस श्रुतज्ञान का दूसरा नाम लिंगश्रु तज्ञान भी है। (२) श्रोत्रन्द्रियजन्य मतिज्ञानपूर्वक जो श्रु तज्ञान होता है उसे अक्षरात्मक श्रु तज्ञान कहते हैं तथा इसको शब्दज श्रु तज्ञान भी कहते हैं । अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान को यही परिभाषा सर्वाधिक प्रचलित है। अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक रूप से जो श्रु तज्ञान के दो भेद किये गये हैं इनका सबसे प्राचीन उल्लेख अकलंक के तत्त्वार्थवार्तिक में मिलता है। अकलंकदेव का कहना है कि स्मृति, तर्क, अनुमान आदि प्रमाणों के द्वारा जब ज्ञाता स्वयं जानता है उस समय वे अनक्षर त हैं जब वह इनके द्वारा दूसरों को ज्ञान कराता है तो वे अक्षरश्रु त हैं। ऊपर जो अक्षर और अनक्षरश्रत की परिभाषा दी गयी है उसकी अकलंकदेव के उक्त कथन के साथ संगति नहीं बैठती है। क्योंकि इनके अनुसार तो एक ही श्रु तज्ञान अनक्षरात्मक भी होता है और अक्षरात्मक भी होता है। जब तक वह ज्ञान रूप रहता है तब तक अनक्षरात्मक है और जब वह वचनरूप होकर दूसरे को ज्ञान कराने में कारण होता है तब वही अक्षरात्मक कहा जाता है। यदि हम दोनों परिभाषाओं की तुलना करें तो दोनों में कोई विशेष अन्तर नहीं है । प्रचलित परिभाषा के अनुसार तो अक्षर के निमित्त से होने वाला श्र तज्ञान अक्षरात्मक है और अकलंकदेव के अनुसार अक्षरोच्चारण में निमित्तज्ञान अक्षरात्मक है । परन्तु विचार करने पर दोनों ही श्रु तज्ञानों को अक्षरात्मक मानना उचित प्रतीत होता है । क्योंकि वास्तव में ज्ञान अक्षरात्मक नहीं होता है वह तो भाव रूप ही होता है और अक्षर द्रव्यरूप होता है। किन्तु ज्ञान अक्षर के निमित्त से उत्पन्न होता है इसलिये इसको (ज्ञान को) अक्षरात्मक कहते हैं। वैसे अक्षर के निमित्त के बिना जो जो श्रु तज्ञान होता है वह अनक्षरश्रु त है। श्रुतज्ञान के अनक्षरात्मक और अक्षरात्मक रूप से जो दो भेद किये गये हैं वे श्वेताम्बर परम्परा को भी मान्य हैं किन्तु इनके स्वरूप के विषय में दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्परा में आंशिक मतभेद है। श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार अक्षर और अनक्षरश्रत ये दोनों ही शब्दज है । अन्तर केवल इतना ही है कि अक्षरात्मक श्रु तज्ञान अक्षरात्मक शब्द से उत्पन्न होता है और अक्षरात्मक श्रु तज्ञान अनक्षरात्मक शब्द से उत्पन्न होता है। किन्तु दिगम्बर परम्परा में शब्दज श्रतज्ञान को अक्षरात्मक और लिंगज को अनक्षरात्मकथत माना गया है। यद्यपि यह बात तो दिगम्बर परम्परा भी मानती है कि श्र तज्ञान में शब्द की प्रधानता होती है। और गोम्मटसार के जीवकाण्ड में तो स्पष्टतया Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210977
Book TitleJain Darshan me Agam Praman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHarindrabhushan Jain
PublisherZ_Pushkarmuni_Abhinandan_Granth_012012.pdf
Publication Year
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Samyag Darshan
File Size944 KB
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