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________________ ६३० : सिद्धान्ताचार्य पं० फूलचन्द्र शास्त्री अभिनन्दन-ग्रन्थ ६. कर्तृकर्ममीमांसा ७. षट् कारक मीमांसा ८. क्रम नियमित पर्याय मीमांसा ९. सम्यक् नियति स्वरूप मीमांसा १०. निश्चय व्यवहार मीमांसा ११. अनेकान्त-स्याद्वाद मीमांसा १२. केवलज्ञान-स्वभाव मीमांसा इनमेंसे प्रत्येक प्रकरण अपनी-अपनी खास विशेषता रखता है, और उसे ध्यानपूर्वक आद्योपान्त पढ़नेसे जैन दर्शनके विविध मूल अंगोंका तलस्पर्शी ज्ञान होने में बहुत सहायता मिलती है। उनके सम्बन्धमें विद्वानोंमें भी जो गलत धारणाएं तथा वैसी प्ररूपणाएँ दृष्टिगोचर होती हैं, उन सबका शंका-समाधानके रूपमें सम्यक् प्रकारसे निरसन किया गया है । ऐसा एक भी विषय नहीं है जिसपर जिनागममें पर्याप्त प्रकाश न डाला गया हो। किन्तु उन सबका सुव्यवस्थित संकलन तथा उनपर पूर्वाचार्योंके वचनाधारसे किया गया संतुलित विवेचन पाठकों के सामने एकत्र आनेकी आवश्यकता थी, जो इस ग्रन्थसे पूरी हुई है। पण्डितजी इस सम्बन्धमें स्वयं लिखते हैं इसमें हमारा अपना कुछ भी नहीं है। जिनागमसे जो विषय अवलोकनमें आए, उन्हें ही यहाँ ग्रन्थरूपी मालामें पिरोया गया है । वह भी इसलिए कि मोक्षमार्गमें तत्वस्पर्शके समय इन सब तथ्योंको हृदयंगम कर लेना आवश्यक है । अन्यथा स्वरूप-विपर्यास, कारण-विपर्यास तथा भेदाभेद-विपर्यास बना ही रहता है, जिससे अनेक शास्त्रोंमें पारंगत होकर और प्रांजल वक्ता बन जानेपर भी इस जीवकी मोक्षमार्गमें गति होना संभव नहीं है।' आगे वे लिखते हैं-"यह ग्रन्थ परमत-खण्डनकी दृष्टिसे संकलित नहीं किया गया है। इसमें जिन तथ्योंको संकलित किया गया है वे जैनतत्त्वमीमांसाके प्राणस्वरूप है, इसलिए परमतखण्डनमें जहाँ प्रायः व्यवहारनयकी मुख्यता रहती है, वहाँ इसमें परमार्थप्ररूपणाको मुख्यता दी गई है, और साथ ही उसका व्यवहार भी दिखलाया गया है। नियम है कि पूर्णरूपसे निश्चयस्वरूप होनेके पूर्वतक यथासम्भव निश्चय-व्यवहारकी युति युगपत् बनी रहती है । यहाँसे निश्चय मोक्षमार्गका प्रारम्भ होता है, वहाँसे प्रशस्त रागरूप व्यवहार मोक्षमार्गका भी प्रारंभ होता है । न कोई पहले होता है, न कोई पीछे । दोनों एक साथ प्रादुर्भुत होते हैं। इतना अवश्य है कि निश्चय स्वरूप मोक्षमार्गके उदयकालमें उसके प्रशस्त रागरूप व्यवहार मोक्षमार्गकी चरितार्थता लक्ष्यमें न आवे, इस रूपमें बनी रहती है। और जब यह जीव अरुचिपूर्वक हटे बिना व्यवहार मोक्षमार्गके अनुसार बाह्य क्रियाकांडमें प्रवृत्त होता है, तब इसके जीवनमें निश्चय मोक्षमार्गकी जागरुकता निरन्तर बनी रहती है। वह दृष्टिसे ओझल नहीं होने पाती । यह इसीसे स्पष्ट है कि निश्चय मोक्षमार्गका अनुसरण व्यवहार मोक्षमार्ग करता है। व्यवहार मोक्षमार्गका अनुसरण निश्चय मोक्षमार्ग नहीं करता। क्योंकि जैसेजैसे निश्चय मोक्षमार्गसे जीवन पुष्ट होता जाता है, वैसे-वैसे व्यवहार मोक्षमार्ग निश्चय मोक्षमार्गका पीछा करना छोड़ता जाता है।" ___ इस ग्रन्थका प्रथम संस्करण १९६० में जब प्रकाशित हुआ, तब इसका सामूहिक स्वाध्याय परमपूज्य गुरुदेव १०८ श्री समन्तभद्र महाराज तथा विदुषी गजाबहनजीके साथ करनेका अवसर हमें प्राप्त हुआ था। तभीसे इस ग्रन्थकी मौलिकता एवं उपयोगिहा विशेष रूपसे प्रतीत हुई थी। उसके बाद इस ग्रन्थके विराधमें आलोचनात्मक कुछ पुस्तकें प्रकाशित हुई। लेकिन इस आलोचनामें निर्दोष तत्त्वमीमांसाके बजाय तत्त्वकी Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210956
Book TitleJain tattva Mimansa Ek Pramanik Kruti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManikchandra Bhisikar
PublisherZ_Fulchandra_Shastri_Abhinandan_Granth_012004.pdf
Publication Year
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Logic
File Size389 KB
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