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________________ o ४३० कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ पंचम खंड इस प्रकार लगभग ३६०० पृष्ठों में यह कोश समाप्त होता है । पाँच भाषाओं में अनूदित होने के कारण इसे हम 'पंचभाषाकोष' भी कह सकते हैं। इस कोश में अभिधान राजेन्द्रकोश की कमियों को दूर करने का प्रयत्न किया गया है। अर्ध मागधी के अतिरिक्त प्राकृत बोलियों के शब्दों को भी इसमें स्थान प्राप्त है । यह कोश चित्रमय भी है; जैसे आवलिका बंध विमान, आसन, ऊर्वलोक, उपशमश्रेणी, मनकावली, कृष्णराजी कालचक्र, क्षपक श्रेणी, धनरज्जु आदि पारस्परिक चित्र प्रमुख हैं। इस कोश का पूरा नाम An Illustrated Ardh Magadhi Dictionary है । इसका प्रकाशन एस० एस० जैन कान्फ्रेस इन्दौर से हुआ है। मुनि रत्नचन्द्रजी का यह कोश छात्रों और शोधकों के लिए उद्धरण ग्रन्थ है। पं० हरगोविन्ददास त्रिकमचन्द्र सेठ पाइय-समय सेठजी का जन्म वि० सं० १९४५ में राधनपुर (गुजरात) में हुआ। इनकी शिक्षा यशोविजय जैन पाठशाला, वाराणसी में हुई। इन्होंने यहाँ संस्कृत एवं प्राकृत का अध्ययन भी किया । आप पालि का अध्ययन करने के लिए श्रीलंका भी गये। बाद में संस्कृत गुजराती एवं प्राकृत के अध्यापक के रूप में कलकत्ता विश्वविद्यालय में नियुक्त हुए। यशोविजय जैन ग्रन्थमाला से आपने अनेक संस्कृत - प्राकृत ग्रन्थों का सम्पादन भी किया। लगभग ५२ वर्ष की अवस्था में संवत् १६७७ में आप भौतिक शरीर से मुक्त हो गये । I विद्वानों का ऐसा अनुमान है कि सेठ जी ने इस कोश ग्रन्थ की रचना 'अभिधान राजेन्द्र कोश' की कमियों को दूर करने के लिए की इन्होंने स्वयं लिखा है-इस तरह प्राकृत के विविध भेदों और विषयों के जैन तथा जैनेतर साहित्य के यथेष्ट शब्दों के संकलित आवश्यक अवतरणों से युक्त शुद्ध एवं प्रामाणिक कोश का नितान्त अभाव रहा। इस अभाव की पूर्ति के लिए मैंने अपने उक्त विचार को कार्य रूप में परिणत करने का दृढ़ संकल्प किया और तदनुसार ही प्रयत्न भी शुरू कर दिया। जिसका फल प्रस्तुत कोश के रूप में चौदह वर्षों के कठोर परिश्रम के पश्चात् आज पाठकों के सामने है। ५० पृष्ठ की विस्तृत प्रस्तावना लिखी। शब्द के साथ किसी ग्रन्थ का प्रमाण भी बताया है। अतः यह कोश अत्यन्त उपयोगी कोशकार ने इस कोश को बनाने में अपार परिश्रम तथा धन व्यय किया । इन्होंने आधुनिक ढंग से लगभग इस ग्रन्थ के निर्माण में लगभग ३०० ग्रन्थों से सहायता ली गयी । प्रत्येक दिया गया है। एक शब्द के सभी सम्भावित अर्थों को भी कोशकार ने बन पड़ा है। : सम्पादक - जुगलकिशोर मुख्तार पुरातन जैन वाक्य सूची - मुख्तार जी प्राचीन जैन विद्या के विख्यात अनुसन्धाता थे। आपने अपने जीवन के पचास वर्ष खोज एवं अनुसन्धान में ही व्यतीत किये हैं। आपके ग्रन्थों में गागर में सागर भरा है । Jain Education International इसमें ६४ मूल ग्रन्थों के पद्य वाक्यों की वर्णादिक्रम । इसमें कुल २५३२५२ प्राकृत पद्यों की अनुक्रमणका पुरातन जैन वाक्य सूची वास्तव में एक कोश ग्रन्थ है। से सूची दी है। इसी में टीकाओं से प्राकृत पद्य भी दिये गये हैं है । इसके सहायक ग्रन्थ दिगम्बर सम्प्रदाय के हैं । यह ग्रन्थ शोधकों के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं। इसका प्रकाशन वीर सेवा मन्दिर से सन् १६५० में हुआ । इस ग्रन्थ की प्रस्तावना में सम्बद्ध ग्रन्थों और आचार्यों के समय तथा उनके सहयोग पर भी कहा गया है। सम्पादक युगल किशोर मुख्तार, पं० परमानन्द शास्त्री जैन प्रशस्ति संग्रह इस प्रशस्ति संग्रह के दो भाग हैं । प्रथम भाग का सम्पादन श्री जुगलकिशोर मुख्तार जी ने किया है। इस कोश में संस्कृत - प्राकृत भाषाओं के १७१ ग्रन्थों की प्रशस्तियों का संकलन किया गया है। ये सभी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं । इनमें संघ, १. पाइयसद्दमहण्णव, भूमिका, पृ० १४ (द्वितीय संस्करण) For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.210934
Book TitleJain Sahitya me Kosh Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyasagar Rai
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages13
LanguageHindi
ClassificationArticle & Dictionary
File Size693 KB
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