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________________ एयं खु णाणिणो सारं जं न हिंसइ कंचणं । अहिंसा समयं चैव एतावंत विजाणिया | अर्थात् - बुद्धिमान सब युक्तियों द्वारा जीव का जीवपन सिद्ध करके यह जाने कि सब जीव दुख के (जिन्हें दुख अप्रय है ) हैं तथा इसी कारण किसी की भी हिंसा नहीं करे। ज्ञानी पुरुषों का यही उत्तम ज्ञान है कि वे किसी जीव की हिंसा नहीं करते । 'सूत्रकृतांग' का उक्तांश अहिंसाव्रत पालन की दिशा में निश्चित मार्गदर्शन देता है। अहिंसा का आचरण करने वाला बुद्धिमान व्यक्ति ही यथार्थ में बुद्धिमान होता है । ऐसे बुद्धिमान के लिए अपेक्षित है कि - सर्वप्रथम तो वह सभी जीवों के समत्व को स्वीकारे और इस आधार पर बिना किसी प्रकार का भेद करते हुए सभी जीवों को समान रूप से महत्वपूर्ण समझे । - उसके लिए यह तथ्य हृदयंगम करना भी आवश्यक है कि सभी प्राणी सुख की कामना करते हैं और दुःख सभी के लिए अप्रिय होता है । - इन बातों को भली-भाँति समझकर उसे (बुद्धिमान को ) किसो भी जीव की हिंसा नहीं करनी चाहिए । 'तिविहेण विपाण मा हणे, आयहिते अनियाण संबुडे ।' ५७० सूत्रकृतांग के प्रस्तुत अंश में अहिंसा की व्याख्या और भी सूक्ष्मता के साथ हुई है, जिसमें व्यक्त किया गया है कि मन, वचन और काया इन तीनों से किसी भी प्राणी को नहीं मारना चाहिए । इस मान्यता को और भी समग्रता की ओर ले जाने की दृष्टि से इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि कृत, कारित, अनुमोदित - मनसा, वाचा, कर्मणा प्राणिमात्र को कष्ट न पहुँचाना ही पूर्ण अहिंसा है। इस आशय का प्रतिबिम्ब 'आवश्यक सूत्र' में भी मिलता है कुसुम अभिनन्दन ग्रन्थ : परिशिष्ट Jain Eation International 'जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं, मणेण वायाए कारणं न करेमि न करावेमि करतंपि न समणुजाणामि' प्रस्तुत उक्ति में ३ योग - मन, वचन और काय एवं ३ करण - करना, करवाना एवं अनुमोदन करना -- की चर्चा है और कहा गया है कि मैं इनमें से किसी के द्वारा किसी की भी हिंसा नहीं करूँ । इन ३ योग और ३ करण के संयोग से ६ योग-करण स्थितियाँ बनती हैं, जो निम्नानुसार हैं (क) मन से - ( १ ) हिंसा न करना (२) हिंसा नहीं करवाना ( ३ ) हिंसा का अनुमोदन नहीं करना । (ख) वचन से -- ( ४ ) हिंसा न करना (५) हिंसा नहीं करवाना ( ६ ) हिंसा का अनुमोदन नहीं करना । (ग) काय से - (७) हिंसा न करना (८) हिंसा नहीं करवाना (६) हिंसा का अनुमोदन नहीं करना । ये मार्ग हैं, जिनमें से किसी का भी अनुसरण करने से व्यक्ति हिंसा का आचरण कर लेता है । इनसे बचकर ही कोई पूर्ण अहिंसा का पालन कर सकता है। हिंसा की अति सूक्ष्मतम अवस्थाओं को भी जैनाचार ने अनुपयुक्त माना है । किसी अन्य जन द्वारा की गई हिंसा के प्रति यदि कोई व्यक्ति केवल समर्थन का भाव भी रखता है - चाहे उसे वह व्यक्त न भी करे- तो भी यह समर्थक व्यक्ति द्वारा की गई हिंसा होगी। जैन धर्म अहिंसा का इस गहनता के साथ पालन किये जाने पर बल देता है । डा० वशिष्ट नारायण सिन्हा ने इस स्वरूप को जैन दृष्टि से अहिंसा का वास्तविक और समग्र स्वरूप स्वीकारा है । अहिंसा : निषेधमूलक भी और विधिमूलक भी भाषा - शास्त्रीय दृष्टि से 'अहिंसा' शब्द रचना से निषेधात्मक विचार प्रकट होता है । अर्थात्हिंसा का न करना ही अहिंसा है । स्पष्ट है कि किसी प्राणी को किसी प्रकार का कष्ट अथवा हानि पहुँचाना हिंसा है और ऐसे कृत्यों का परि साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ www.jainelibrary.c
SR No.210889
Book TitleJain Sanskruti aur uska Avadan Jainachar ka Pran Ahimsa
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupamashreeji
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ahimsa
File Size2 MB
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