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________________ जैन वाक्य दर्शन 153 वक्ता के अभिप्राय से प्रतिनियत विशेषण का उसे विशेष्य में अन्वय हो वाक्य के अर्थबोध के लिए पदों की सापेक्षता/सम्बन्धितता आवश्यक जाता है तो यह कथन भी समीचीन नहीं है, क्योंकि जिस पुरुष के प्रति है। जैनाचार्यों के अनुसार परस्पर सापेक्ष पदों का निरपेक्ष समूह वाक्य शब्द का उच्चरण किया गया है उसे तो वक्ता का अभिप्राय ज्ञात नहीं है। अत: वाक्यार्थ के बोध में पद सापेक्ष अर्थात् परस्परान्वित ही प्रतीत होता है। अत: विशेषण का निर्णय सम्भव नहीं होगा। यदि यह कहा होते हैं। जाये कि वक्ता को अपने अभिप्राय का बोध होता ही है अत: वह तो यद्यपि इस समग्र विवाद के मूल में दो भिन्न-भिन्न दृष्टियाँ प्रतिनियत विशेषका निश्चय कर ही लेगा।किन्तुऐसा मानने पर शब्दिक कार्य कर रही हैं। अभिहितान्वयवाद के अनुसार वाक्य पद सापेक्ष है। कथन करना अनावश्यक होगा; क्योंकि शब्द का कथन दूसरों का अर्थ वे वाक्य में पदों की सत्ता को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। जबकि अन्विताभिधानवाद की प्रतिपत्ति कराने के लिए होता है स्वयं अपने लिए नहीं। तीसरा में पदों का अर्थ वाक्य सापेक्ष है, वाक्य से स्वतन्त्र न तो पदों की कोई विकल्प अर्थात् विशेष्यपद विशेष्य को उभय से अन्वित कहता है, यह सत्ता ही है और न उसका कोई अर्थ ही है। वे पदों के अर्थ को वाक्य माने पर उभयपक्ष के दोष आवेंगे अर्थात् न तो विशिष्ट वाक्यार्थ का सापेक्ष मानते हैं। अभिहितान्वयवाद में पद, वाक्य की महत्त्वपूर्ण इकाई बोध होगा और न निश्चयात्मक ज्ञान होगा। है जबकि अन्विताभिधानवाद में वाक्य ही महत्त्वपूर्ण एवं समग्र इकाई इसी प्रकार की आपत्तियाँ विशेष्य को क्रियापद और क्रिया- है, पद गौण है यही दोनों का मुख्य अन्तर है जबकि जैन दार्शनिक विशेषण से अन्वित मानने के सम्बन्ध में भी उपस्थित होगी। पुनः दोनों को ही परस्पर सापेक्ष और वाक्यार्थ के बोध में आवश्यक मानते पूर्वपक्ष के रूप में मीमांसक प्रभाकर यदि यह कहें कि पद से पद के हैं। इस प्रकार वे इन दोनों मतों में समन्वय स्थापित करते हैं और कहते अर्थ का ज्ञान उत्पन्न होता है और फिर वह वाक्यार्थ का निश्चय करता हैं कि वाक्यार्थ के बोध में पद और वाक्य दोनों की ही महत्त्वपूर्ण है किन्तु ऐसा मानने पर तो रूपादि के ज्ञान से गंधादि का निश्चय भी भूमिका है। मानना होगा, जो कि तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है।अत: अन्वित अभिधानवाद अर्थात् पदों से पदान्तरों के अर्थों से अन्वित अर्थों का ही संदर्भ कथन होता है पदों के अर्थ की प्रतीति से वाक्य के अर्थ की प्रतीति 1. (अ) पदानां तु तदपेक्षाणां निरपेक्षः समुदायो वाक्यमिति। होती है- ऐसा प्रभाकर का मत श्रेयष्कर नहीं है। -प्रमयेकमलमार्तण्ड, पृ० 458 / वस्तुत: अभिहितान्वयवाद और अन्विताभिधानवाद दोनों ही (ब) पदानां पुनर्वाक्यार्थं प्रत्यायने विधेयेऽन्योन्यनिर्मिततोपकारमनुसरतां एकांगी हैं। जैन दार्शनिक अभिहितान्वयवाद की इस अवधारणा से वाक्यान्तरस्थपदाक्षेपारहितासंहतिर्वाक्यमभिधीयते। सहमत हैं कि पदों का शब्द के रूप में वाक्य से स्वतन्त्र अर्थ भी होता -स्याद्वादरत्नाकर, पृ० 941 / है किन्तु साथ ही वे अन्विताभिधानवाद से सहमत होकर यह भी मानते 2. (अ) पदार्थानां तु मूलत्वमिष्टं तद्भावनावतः।। मीमांसाश्लोकवार्तिक हैं कि वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद अपने अर्थबोध के लिए परस्पर वाक्यपदी१११॥ सापेक्ष होता है अर्थात् वे परस्पर अन्वित (सम्बन्धित) होते हैं और (ब) पदार्थपूर्वकस्तस्माद्वाक्यार्थोयमवस्थितः।। मीमांसाश्लोकवार्तिक सम्पूर्ण वाक्य के श्रवण के पश्चात् उससे हमें जो अर्थबोध होता है उसमें वाक्यपदी 336 / पद परस्पर अन्वित या सापेक्ष ही प्रतीत होते हैं, निरपेक्ष नहीं है- 3. प्रमयेकमलमार्तण्ड (प्रभाचन्द्र), पृ० 464-65 / क्योंकि निरपेक्ष पदों से वाक्य की रचना ही नहीं होती है। जिस प्रकार 4. देखें- काव्यप्रकाश आचार्य विश्वेश्वर पृ० 37 / शब्द के अर्थबोध के लिए वर्गों की सापेक्षता आवश्यक है, उसी प्रकार 5. प्रमेयकमलमार्तण्ड 3/101 पृ० 459-464 / Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210854
Book TitleJain Vakya Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Shwetambar_Sthanakvasi_Jain_Sabha_Hirak_Jayanti_Granth_012052.pdf
Publication Year1998
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size2 MB
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