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________________ जैन पुराणकालीन भारत में कृषि २०५ एवं समय से होने पर फसल अच्छी होती थी ।' कुआँ २, सरोवर, तडाग तथा वापी" के जल को सिंचाई के लिये प्रयोग करते थे । उस समय घण्टीतंत्र (अरहट या रहट ) द्वारा कुओं, तालाबों आदि से जल निकालकर सिंचाई करते थे । खेतों की सिंचाई के लिये नहरें अत्यधिक लाभप्रद थीं । नहरों से नालियों का निर्माण कर कृषक अपने खेतों में पानी ले जाते थे । उस समय झील, नदी, कुआँ, मशीन कुआँ, अरहट, तालाब तथा नदी बाँध से सिंचाई की जाती थी । " कृषक खेत में बीज वपन करने के उपरान्त सिंचाई कर उसकी निराई, गोड़ाई आदि करते थे । इसके अनन्तर पुनः सिंचाई की जाती थी । फसलों के पक जाने पर उसकी कटाई कर उसे खलिहान में एकत्रित करते थे । फिर बैलों से ढँवरी चलाकर मड़ाई की जाती थी । मड़ाई के उपरान्त अनाज और भूसे को पृथक् करने के लिये ओसाई की जाती थी । तदनन्तर अनाज को घर ले जाते थे । खाने के लिये अनाज का प्रयोग करते थे । भूसे को बैल, गाय, भैंस को खिलाने के लिये रखते थे । खेती की रक्षा करना परमावश्यक था । बिना खेती की रक्षा के फसल का लाभ नहीं मिल सकता । इसमें कृषक की बालाएँ पशुपक्षियों से खेत की रक्षा करती थीं । १° चञ्चापुरुष का भी उल्लेख महापुराण में हुआ है, जिनको देखकर जानवर भाग जाते थे । ११ 2 उपलब्ध साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक साक्ष्यों से उस समय अग्रलिखित अनाज होते थे - ब्रीहि, साठी, कलम, चावल, यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), कांगनी (कंगव), श्यामाक ( सावाँ), कोद्र ( कोदो), नीवार, वरफा (बटाने), तिल, तस्या (अलसी), मसूर, सर्षप (सरसों), धान्य १. महापुराण ४।७९; एपिग्राफिका इण्डिका, जिल्द २०, पृ० ७ पर सिंचाई के साधनों के विषय में विशेष रूप से प्रकाश पड़ता है । २. महापुराण ४।७२ ३. वही ५। २५९; पद्मपुराण २।२३ ४. वही ४।७२ ५. वही ५।१०४ ६. पद्मपुराण २।६, ९।८२; महापुराण १७।२४; हरिवंश पुराण ४३।१२७ ७. महापुराण ३५/४० ८. अपराजितपृच्छा पृ० १८८ ९. महापुराण ३।१७९-१८२, १२/२४४, ३५।३० पद्मपुराण २।१५ १०. वही ३५।३५-३६, मनुस्मृति ७।११० पर टीका ११. वही २८।१३०; देशीनाममाला २६ १२ . वही ३।१८६-१८८; पद्मपुराण २१३-८; हरिवंशपुराण १४।१६१-१६३, १९।१८, ५८ ३२, ५८।२३५; जगदीशचन्द्र जैन - जैन आगम साहित्य में भारतीय समाज, पृ० १२३ - १३०; बी० एन० एस० यादव सोसाइटी एण्ड कल्चर इन द नार्दर्न इण्डिया, पृ० २५९; सर्वानन्द पाठक - विष्णु पुराण का भारत, पृ० १९८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210816
Book TitleJain Purankalin Bharat me Krushi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeviprasad Mishra
PublisherZ_Parshvanath_Vidyapith_Swarna_Jayanti_Granth_012051.pdf
Publication Year1994
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size348 KB
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