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________________ २० : श्री महावीर जैन विद्यालय सुवर्णमहोत्सव ग्रन्थ वैष्णव मतोंके प्रचारसे जैन धर्म अवनतिकी ओर अग्रसर होने लगा। सातवीं शतीका पल्लव राजा महेन्द्रवर्मा जैन था, परंतु बादमें शैव हो गया। पाण्ड्य राजा सुन्दर पक्का जैनी था, परंतु उसकी रानी और मन्त्री शैव थे उनके कारण तथा शैव भक्तकवि सम्बन्दरके प्रभावसे वह शैव हो गया। शैव नायनारोंके कारण सातवीं-आठवीं शतीसे जैन धर्मको काफी धक्का पहुंचा। - आठवीं शतीसे वैष्णव अल्वारोंने भी जैनोंका जबरदस्त विरोध करना शुरू कर दिया था। फिर भी ८वीं से १२वीं शती तकके राजाओंने निष्पक्ष भावसे जैनोंके प्रति सहानुभूति भी बर्ती थी। सितन्नवासलमें ८वीं-९वीं शताब्दीके जैन शिलालेख तामिल भाषामें प्राप्त होते हैं। नवीं शती में ट्रावनकोरका तिरुच्छा नझुमलै श्रमणोंके पर्वतके रूपमें विख्यात था। १०वीं-११वीं शती में चोल और पाण्ड्य देशोंमें सर्वत्र जैन लोग विद्यमान थे। १३वीं शतीमें उत्तर आरकोटमें जैनोंके अस्तित्वके बारेमें अच्छे प्रमाण मिलते हैं। तिरुमलै स्थानके १०वीं-११वीं और १४वीं शती तकके शिलालेखोंसे मालूम होता है कि वह उस समयमें जैन केन्द्र बना हुआ था। १५वीं-१६वीं शतीका बड़ासे बड़ा कोशकार मंडलपुरुष हुआ जिसने निघंटू चूडामणिकी रचना की। आन्ध्र प्रदेश (पूर्वकालीन दक्षिण उड़ीसा, कलिंगादि) कलिंग देश(तोसलि)में स्वयं महावीर गये थे। नन्द राजाओंके समय में कलिंग-उड़ीसामें जैनोंका काफी प्रचार हो चुका था। खारवेल के समय ई० पू० दसरी शती में यहाँ पर जैन धर्मको बहत प्रोत्साहन मिला क्योंकि वे स्वयं जैन थे। यहांके उदयगिरि-खण्डगिरिकी गुफाओंमें १०वीं शती तकके जैन शिलालेख मिलते हैं। सातवीं शतीमें ह्वेनसांगने कलिंग देशको जैनोंका गढ़ बताया है। उसके बाद सोलहवीं शताब्दीमें भी उस क्षेत्र के राजा प्रताप रुद्रदेवके जैन-सहिष्णु होनेके उल्लेख हैं। सम्राट सम्प्रतिके द्वारा आन्ध्र प्रदेशमें जैन धर्मको फैलाने के उल्लेख जैन साहित्यमें आते हैं। ईसाकी दूसरी शती में कुडापामें सिंहनंदिको दो राजकुमार मिले थे जिन्होंने कर्नाटकके गंगवंशकी स्थापना की थी। अतः उस समय इस प्रदेशमें जैन धर्म काफी प्रचलित होगा। कालकाचार्य के कथानकसे राजा सातवाहन हालकी जैनधर्मके प्रति सहानुभूति होनेकी झलक मिलती है। पूज्यपादके पांचवीं शतीमें आन्ध्र जानेके उल्लेख मिलते हैं। पूर्वी चालुक्योंने सातवीं शतीमें इस प्रदेशमें जैन धर्मको प्रगति प्रदान की थी। उस समय विजयानगर के पास रामतीर्थ जैनोंका केन्द्र बना हुआ था। आन्ध्र के कोमटी एक समृद्ध वणिक जाति है। वे मैसूरसे इधर आये थे। गोमटेश्वरके भक्त होने के कारण गोमटीसे वे कोमटी कहलाने लगे। ___ आन्ध्रमें जैन साहित्य उचित मात्रामें उपलब्ध नहीं हुआ है। मालूम होता है, वह नष्ट कर दिया गया है। क्योंकि पुराने में पुराने तेलगु महाभारतमें नन्नय भट्टनेने अपने पूर्वके लेखकोंका स्मरण क्यों नहीं किया। इसका कारण यह है कि उसके पूर्वके कवि जैन थे। इसके अतिरिक्त कर्नाटक के पम्प और नागवर्म जैसे बड़ेसे बड़े कवि या तो आन्ध्र देशके थे या वहां से सम्बन्धित थे। इसलिए आन्ध्रमें जैन साहित्यकी रचना अवश्य हुयी होगी जैसा कि तामिल और कन्नड भाषाओंमें स्रजन हुआ है। संस्कृत जैनेन्द्र कल्याणाभ्युदयकी रचना १४वीं शती में वेरंगल-अय्यपार्यके द्वारा की गयी थी। कर्नाटक भद्रबाहुके श्रवण बेलगोल जानेका उल्लेख ऊपर कर आये हैं। वहीं पर सम्राट चन्द्रगुप्तने समाधिमरण प्राप्त किया था। उस समयसे जैन धर्मका प्रवेश इस प्रदेशमें हो चुका था। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210786
Book TitleJain Dharm ka Prasar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorK Rushabhchandra
PublisherZ_Mahavir_Jain_Vidyalay_Suvarna_Mahotsav_Granth_Part_1_012002.pdf and Mahavir_Jain_Vidyalay_Suvarna_
Publication Year
Total Pages17
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size2 MB
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