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________________ हस्तलिखित जैन ग्रन्थों एवं तत्कालीन प्रस्तर शिलालेखों से हमें “श्रीमऊज्ञात होता है कि जयसिंह ने अपने साम्राज्य पर ज्यो-ज्यों पकड़ जयसिंह मजबूत की उसे क्रमश: उन्नत उपाधियाँ प्रदत्त की गईं। जयसिंह के प्रिय' राज्यारोहण के सात वर्षों पश्चात् वि०सं० ११५७ (११००ई०) स्वर्गीय मुद्राशास्त्री डॉ० परमेश्वरीलाल गुप्त के अनुसार में रचित 'निशिथ चूर्णि' में जयसिंह को केवल मात्र 'श्री जयसिंह सिक्कों पर प्रयुक्त 'प्रिय' शब्द बड़ा ही अटपटा-सा लगता है। डॉ० देवराज्ये' अर्थात् 'जयसिंह के राज्य काल में' से सम्बोधित किया गुप्त के अनुसार इस शब्द का प्रयोग 'वीसलदेव प्रिय द्रम्म' के रूप गया है।३२ राजा को विरुद रहित सम्बोधन से उद्धृत किया जाना में प्राय: अभिलेखों में देखा जाता है। कदाचित् इसका अभिप्राय उसके अप्रभाव का परिचायक है। ऐसा आभासित होता है कि आत्मीयता प्रकट करना है।३९ डॉ० गुप्त ने इन सिक्कों का जयसिंह उस काल में केवल मात्र सिंहासन का ही अधिकारी बन तारतम्य प्रतिहार राजा वत्सराज जिसने रणहस्ति विरुद धारण किया सका होगा। इसके तीन वर्षोपरान्त रचयित वि० सं० ११६० था। उनके भी चित भाग पर दक्षिणाभिमुख हाथी और पट भाग पर (११०४ ई०) की जैन हस्तलिखित कृति 'आदिनाथ चरित' से 'रण-हस्ति' आलेख है। परन्तु मेरी धारणा है कि जयसिंह के प्रकाश पड़ता है कि जयसिंह का राज्य-विस्तार 'केमबे' तक हो सिक्कों की तुलना वत्सराज से करना समीचीन नहीं होगा। कारण गया था।३३ चार वर्षों पश्चात् हमें सं० ११६४ (११०८ ई०) में चालुक्य वंशीय जयसिंह 'प्रतिहार वत्सराज' के आठवीं शताब्दी रचित एक हस्तलिखित जैन ग्रंथ प्राप्य है। इसमें जयसिंह को (ई० ७७८-७८८) के सिक्कों की भाँति सिक्के ५०० वर्षों 'समस्त राजाबलि-विराजिता-महाराजाधिराज-परमेश्वर श्री जयसिंह उपरान्त क्यों प्रचलित करता? द्वितीयतः प्रतिहार वत्सराज के देव कल्याणे-विजयराज्ये' से सम्बोधित किया गया है।३४ ऐसा सिक्के ६-७ ग्रेन के नन्हें आकार के सिक्के हैं जबकि जयसिंह लगता है कि उस समय तक जयसिंह ने सर्वत्र अपने पराक्रम का द्वारा मुद्रित सिक्कों का वजन २० ग्रेन है। डॉ० गुप्त के अतिरिक्त लोहा मनवा लिया होगा। इसके पश्चात् वि०सं० ११६६ (ई० न तो किसी मुद्राविज्ञ ने जयसिंह सिद्धराज के सिक्कों को उद्धृत ही १११०) में रचित 'आवश्यक सूत्र ग्रंथ' से जयसिंह के एक और किया, नहीं प्रदर्शित किया। विरूद का- 'त्रिभुवन गंड' भान होता है।३५ 'त्रिभुवन गंड' अर्थात् परन्तु जैन वाङ्गमय में हमें इस तथ्य की कुछ व्याख्या मिलती तीनों लोकों का अभिभावक। ऐसा प्रतीत होता है कि जयसिंह का है कि क्यों जयसिंह ने एक ओर हस्ति तथा दूसरी ओर 'जयसिंह सैन्य अभियान उस समय में अपनी पराकाष्ठा पर था। और उसका प्रिय' का उपयोग किया है। हमें विदित है कि राजा भोज की मृत्यु वर्चस्व चहुँ दिशाओं में पैठ गया होगा। फाल्गुन वि० सं० ११७९ के उपरान्त 'परमार' और चालुक्य राजघरानों के मध्य रुष्ठता बढ़ती में विरचित 'पंचवास्तुका ग्रंथ' में उसी विरुदावली को उद्धृत किया ही गई। ‘भोज' के अनुवर्ती राजाओं नरवर्मन तथा उसके पुत्र गया है किन्तु साथ में 'श्रीमत्' और जोड़ दिया गया।३६ उस समय यशोवर्मन कभी भी उज्जैनी की भव्यता एवं कीर्ति को प्रतिष्ठापित तक 'सांतुका' जयसिंह का 'महाकाव्य' अर्थात् मुख्यमंत्री था। नहीं कर सके। किन्तु उन्होंने चालुक्य राजा जयसिंह के साथ अपनी भाद्रपद मास वि०सं० ११७९ में रचित जैनग्रंथ 'उत्तराध्ययन सूत्र' लड़ाई जारी रखी। यशोवर्मन एक बेहद ही कमजोर शासक था। से विदित होता है कि उस समयम में मुख्यमंत्री 'आशुका' हो चुका वह सन् ११३३ ई० से पूर्व मालवा के राजसिंहासन पर आरूढ़ था तथा राजा को अतिरिक्त विरुदावली 'सिद्ध चक्रवर्ती' भी प्रदत्त हुआ। उसके शासन काल में भी जयसिंह के साथ कोई समझौता की गई। ३७ वि०सं० ११९२ में लिखित 'नवपदलघुवृत्ति' एवं नहीं हो सका। फलस्वरूप जयसिंह ने बड़ी तैयारी के साथ मालवा 'गाला शिलालेख' में जयसिंह को 'अवन्तिनाथ' के विरूद से भी पर हमला कर दिया। हेमचन्द्र के अनुसार यह युद्ध बारह वर्षों तक नवाजा गया है। लम्बा चला। वे लिखते हैं- "जयसिंह मालवा की ओर बड़ी ही किन्तु बड़े ही आश्चर्य का विषय है कि जयसिंह की ज्ञात धीमी गति से चला। रास्ते में जितने भी छोटे-बड़े राज्य मिले उन्हें मुद्राओं में उपर्युक्त एक भी विरूद का प्रयोग नहीं किया गया। धराशायी करता गया। भीलों ने भी उसे अपनी सेवायें प्रस्तुत की। संलग्न निखात में मैने प्राप्य १७ सिक्कों के लेख को दर्शाया है। अन्त में उसने अपनी सेना को क्षिप्रा नदी के तट पर तैनात करते इन सिक्कों के उर्ध्व भाग में एक दक्षिणाभिमुख हस्ति का अंकन हुए धार-नगरी पर हमला किया। भयभीत यशोवर्मन मुँह छुपाए धार हुआ है और वाम भाग में तीन पंक्तियों में निम्न आलेख उकेरित के किले में पड़ा रहा। उसने किले के समस्त दरवाजों को बंद । किया गया है : करवाते हुए उन्हें तीखे तुणिरों से आच्छादित कर दिया। जयसिंह ने विद्वत खण्ड/५२ शिक्षा-एक यशस्वी दशक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210785
Book TitleJain Dharm se Anuprerit Shasak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorIndrakumar Kathotiya
PublisherZ_Jain_Vidyalay_Granth_012030.pdf
Publication Year2002
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Biography
File Size789 KB
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