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________________ घटना तब घटित हुई बताई जाती है जब जयसिंह अपनी माता ११२५-२६ से पूर्व कभी भी हुई होगी। मायानल्ला देवी के संग सोमनाथ की तीर्थ यात्रा पर गया हुआ था। जयसिंह की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि अनार्य राक्षस राजा उसके मुख्यमंत्री शांतु को आक्रांता के साथ अपमानजनक शर्तों पर 'बरबरक' पर विजय प्राप्ति था। इस उपलब्धि के पश्चात् ही उसे संधि करनी पड़ी। तीर्थ यात्रा से लौटने के उपरान्त जयसिंह ने इसका 'सिद्धराजा' की उपाधि से विभूषित किया गया।२२ इसी विजयबदला मालवा पर जीत हासिल करके लिया। नरवर्मन के साथ हुए प्राप्ति के पश्चात् उसे 'बरबरक जिष्णु' का विरूद भी प्राप्त हुआ। युद्ध का वर्णन जैन वाङ्गमय में बड़े विस्तार से किया है। इनमें उज्जैन के वि०सं० ११९६ के खण्डयुक्त पाषाण शिलालेख में जयसिंह सूरि रचित 'कुमार पाल चरित', जिनमण्डलगणि रचित इसका स्पष्ट उल्लेख हुआ है।२३ इस युद्ध विषयक वर्णन जैन कृति 'कुमारपाल प्रबन्ध' तथा राजशेखर कृत 'प्रबन्ध कोष' प्रमुख हैं। इन 'वाग भट्टालंकार' २४ में भी गुम्फित है। 'प्रबन्ध कोष' से हमें चन्देल काव्यों से यह जानकारी प्राप्त होती है कि इस युद्ध में जयसिंह ने 'मदनवर्मन' के साथ उसकी राजधानी 'महोबा' के लिए हुए युद्ध नरवर्मन को बंदी बना लिया था। इन रचनाओं से पूर्व की एक कृति विषयक जानकारी प्राप्त होती है। अन्तत: जयसिंह ने छियानवे 'कीर्ति कौमुदी' से जानकारी मिलती है कि जयसिंह ने नरवर्मन की करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त कर युद्ध को समाप्त किया। 'कालींजर' धाः नगरी पर अपनी विजय प्राप्त कर ली। इन साहित्यिक रचनाओं के 'पाषाण शिलालेख' से भी उपर्युक्त घटना पर प्रकाश पड़ता है के अतिरिक्त हमें कतिपय शिलालेखों से भी इस महत्वपूर्ण विजय (जनरल ऑफ एसियाटिक सोसाइटी, १८४८)। की जानकारी मिलती है। 'तालवार' शिलालेख से इस विषय पर हेमचन्द्राचार्य कृत 'चडोनुशासन' २५ तथा वागभट्ट कृत प्रकाश पड़ता है कि जयसिंह ने नरवर्मन का मानमर्दन कर दिया था। अलंकार के लेखन से उजागर होता है कि जयसिंह ने सिंधुराज को इसी प्रकार ललवाड़ा के गणपति मूर्ति लेख से पता चलता है कि युद्ध में हराया था। 'वाग भट्टलंकार' के टीकाकार सिंह देवगणि जयसिंह ने नरवर्मन के घमंड को चूर-चूर कर दिया।१० दोहड़ लिखते हैं कि वह 'सिंधुदेशधीप' अर्थात् सिंध का शासक था। स्तंभ-शिलालेख से ज्ञात होता है कि जयसिंह ने मालवा के राजा जयसिंह के ११४०ई० के 'दोहड़ शिलालेख' में इस युद्ध के को कैद कर लिया था।११ जैन साधु जयमंगल द्वारा रचित 'शुंध विषय में उल्लेख किया गया है।२६ शैल-शिलालेख' से ज्ञात होता है कि इस युद्ध में नाडूल चाहमान सपादलक्ष के 'आनक राजा' (अर्णोराजा) (११३९-११५३ अशराज ने जयसिंह का साथ दिया था।१२ कुमारपाल की बड़नगर ई०) का वर्णन 'प्रबन्ध चिन्तामणि' में किया गया है। उसने प्रशस्ति में भी इस कथानक का उल्लेख है कि किस तरह जयसिंह अर्णोराजा से लाखों वसूल करके छोड़ा।२७ सांभर से प्राप्त एक ने मालवा के राजा का मानमर्दन किया था।१३ । शिलालेख में भी यह उल्लिखित है कि 'आनक' जयसिंह के अधीन लगता है इस मालवा-विजय के उपलक्ष में ही जयसिंह ने हो गया था।२८ 'महाराजाधिराज परमेश्वर'१४ एवं 'त्रिभुवन गण्ड'१५ की उपाधियाँ इसी प्रकार जयसिंह के दक्षिण भारतीय अभियान के विषय में धारण की। भी हमें 'जिन मंडन गिरी' कृत 'कुमारपाल-प्रबन्ध' से ज्ञात होता जयसिंह का द्वितीय महत्वपूर्ण युद्ध सौराष्ट्र के साथ हुआ। आ० है।२९ एक हस्तलिखित जैन ग्रन्थ से जयसिंह के 'देवगिरी' हेमचन्द्र ने 'सिद्ध-हेम-व्याकरण' में सौराष्ट्र विजय का वर्णन किया अभियान के विषय में जानकारी मिलती है। वहाँ से जयसिंह 'पैठान' है।१६ 'कीर्ति कौमुदी' के अनुसार जयसिंह ने शक्तिशाली सौराष्ट्र की ओर अग्रसर हो गया जहाँ के राजा ने उसकी अधीनता स्वीकार के 'खेंगार' को युद्ध में परास्त किया।१७ 'विविध तीर्थ कल्प' में कर ली। 'कल्याण कटक' में उस समय 'विक्रमादित्य-षष्ठ' का भी राजा का नाम 'खेंगार राय उल्लिखित है। १८ इसी प्रकार स्वामित्व था। इसका विरूद 'परमार्दी' था। जयसिंह के 'तालवार 'पुरातन प्रबन्ध संग्रह' में भी इस युद्ध का उल्लेख किया गया है।१८ शिलालेख' में परमार्दी के हार जाने का उल्लेख किया गया है।३० 'प्रबन्ध चिन्तामणि' के अनुसार जयसिंह ने सौराष्ट्र के प्रबन्धन हेतु 'कोल्हापुर प्रबंध चिन्तामणि' के सर्गों से हमें जयसिंह का उस क्षेत्र 'सज्जन' को अपना ‘दण्डाधिपति' अथवा 'राज्यपाल' नियुक्त में अधिकार होने का पता चलता है।३१ किया।२० जयसिंह के राज्यत्वकालीन वि०सं० ११९६ के दोहड इस तरह उपर्युक्त लगभग दस युद्धों में विजय प्राप्त कर शिलालेख में भी यह उल्लिखित है कि उसने सौराष्ट्र के राजा को जयसिंह एक मान्यताप्राप्त योद्धा बन गया था और अपने बाहुबल से बंदी बनाकर कारावास में बंद कर दिया था।२१ 'प्रबंध चिन्तामणि' वह निर्विवादित रूप से सांभर से कोंकण तक का एकाधिपति बन के सूत्रों से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि सौराष्ट्र पर विजय ई० चुका था। शिक्षा-एक यशस्वी दशक विद्वत खण्ड/५१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210785
Book TitleJain Dharm se Anuprerit Shasak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorIndrakumar Kathotiya
PublisherZ_Jain_Vidyalay_Granth_012030.pdf
Publication Year2002
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Biography
File Size789 KB
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