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________________ जैनदर्शन का मर्म है कि धर्म क्रिया में नहीं लक्ष्य में होता है। हम जीवन में किस चीज को पाना चाहते हैं, इस पर धर्मअधर्म निर्भर है। यदि हम सांसारिक ऊँचाई पाना चाहते हैं तो हमारे भीतर धर्म का बीज है। क्योंकि सांसारिक ऊँचाई लक्ष्य होने पर मनुष्य धन-दौलत, सत्ता, प्रभुता और ख्याति की प्राप्ति को ही एकमात्र धर्म मान लेता है, जिसके फलस्वरूप उसकी दृष्टि में किसी भी नैतिक नियम का मूल्य नहीं रहता और वह छल-कपट, हिंसा, अन्याय, किसी भी मार्ग का अवलम्बन कर अपने लक्ष्य को सिद्ध करने की चेष्टा करता है। अतः सांसारिक ऊँचाई पाने का लक्ष्य अधर्म का लक्षण है। इसके विपरीत, आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँचना जिसके जीवन का उद्देश्य होता है, उसकी दृष्टि में धनदौलत, सत्ता, प्रभुता, ख्याति आदि सांसारिक वस्तुओं की निस्सारता पहले ही झलक चुकी होती है। इसलिए वह इन चीजों को पाने के लिए पापमार्ग का अवलम्बन नहीं करता। जीवनोपयोगी वस्तुओं की जितनी आवश्यकता होती है उन्हें वह न्यायमार्ग से ही अर्जित करता है। इसलिए आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँचने का लक्ष्य धर्म का मूलभूत लक्षण है । जैन-दर्शन और धर्म का बीज (डॉ. श्री रतनचन्द्र जैन) इस प्रकार धर्म की जड़ लक्ष्य में होती है, क्रिया में नहीं । यद्यपि जैसा लक्ष्य होता है उसी के अनुसार क्रिया भी होती है, तथापि एक ही किया मित्र-भित्र लक्ष्यों से भी हो सकती है । उदाहरण के लिए पूजा, भक्ति, स्वाध्याय, व्रत, तप आदि शुभ क्रियाएँ सांसारिक सुख, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि लौकिक प्रयोजनों से भी की जा सकती हैं और मोक्षरूप आध्यात्मिक प्रयोजन से भी । अतः इन क्रियाओं के द्वारा यह निर्णय नहीं किया जा सकता कि इन्हें करनेवाला व्यक्ति धार्मिक है या अधार्मिक । यह निर्णय केवल इस तथ्य से किया जा सकता है कि इनके पीछे उसका लक्ष्य क्या है ? यदि ये क्रियाएँ वह लौकिक प्रयोजन से प्रेरित होकर करता है तो निश्चित है कि उसके भीतर धर्म नहीं है। यदि आध्यात्मिक लक्ष्य इन क्रियाओं का स्रोत है तो निश्चित ही करने वाले के भीतर धर्म मौजूद है । इसी प्रकार भोजन-पान, शयन-आसन, जीविकोपार्जन, विवाह, सन्तानोत्पत्ति आदि लौकिक क्रियाएँ प्रायः सभी मनुष्य करते हैं। किन्तु जिसके जीवन का लक्ष्य आत्मा के सर्वोच्च स्वरूप को प्राप्त करना हो जाता है, उसकी ये क्रियाएँ भी धर्म का अंग बन जाती हैं। क्योंकि जब वह भोजन करता है तब स्वाद में उसकी आसक्ति नहीं होती, बल्कि धर्म के साधनभूत शरीर का निर्वाह ही प्रयोजनभूत होता है। जब वह चलता-फिरता, उठता बैठता है तो इस बात का ध्यान रखता है कि उसकी इन क्रियाओं से किसी जीव को पीड़ा न हो। किसी से बात करता है तो मुखमुद्रा कठोर न हो जाय, वाणी में कटुता न आ जाय, इस बात का बराबर ख्याल रखता है । मुद्रा को अत्यन्त प्रसन्न और वाणी को मृदु बनाकर ही बोलता है । आजीविका अर्जित करते समय इस विषय में सावधान रहता है कि श्रीमद् जयन्तसेनसूरि अभिनन्दन ग्रंथ / विश्लेषण Finsp Jain Education International अन्याय का एक भी पैसा उसके पास न आने पावे। उसके ऊपर यदि किसी बात का पूर्ण प्रयत्न करता है कि उसके हाथों किसी के साथ तिल भर भी अन्याय न हो। रिश्वत या घूसखोरी की तो वह स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकता । किसी को संकट में पड़ा देखकर वह कायरतापूर्वक मुख नहीं मोड़ सकता, बल्कि अपने प्राणों को भी खतरे में डालकर उसे संकटमुक्त करने की चेष्टा करता है । इस प्रकार लक्ष्य में अलौकिकता या आध्यात्मिकता आ जाने पर लौकिक क्रियाएँ भी अंशतः अलौकिक या आध्यात्मिक बन जाती हैं। उवमोगर्मिदियेहिं दव्वाणमचेदणाणमिढराणं । जं कुणढि सम्मदिट्ठी तं सव्वं णिज्जरणिमित्तं ॥ अर्थात् सम्यग्दृष्टि आत्मा इन्द्रियों से चेतन और अचेतन द्रव्यों का जितना भी उपभोग करता है वह सब निर्जरा का निमित्त होता है । क र तात्पर्य यह कि सम्यग्दृष्टि जीव का लक्ष्य निज आत्मा के सर्वोच्च स्वरूप को प्राप्त करता होता है अतः यह चेतन-अचेतन पदार्थों का उपभोग ऐन्द्रिय सुख की लालसा से नहीं करता, अपितु शरीर को आध्यात्मिक साधना के अनुकूल बनाये रखने के लिए करता है । फलस्वरूप लक्ष्य की आध्यात्मिकता से उसकी उपभोग क्रिया भी अंशतः आध्यात्मिक बन जाती है और नवीन कर्मबन्ध बहुत मामूली सा (अल्पस्थिति अनुभागवाला) होता है । किन्तु जिसके जीवन का ह्रदय सांसारिक ऐश्वर्य होता है उसकी ये लौकिक क्रियाएँ पापमय ही बनी रहती हैं, क्योंकि वह भोजन करता है तो उसमें स्वाद की लालसा होती है, वस्त्र पहनता है तो शरीर को सजाने का भाव मन में रहता है। चलते-फिरते, उठते-बैठते समय उसे प्राणियों के सुख-दुःख की चिन्ता नहीं रहती। जीविकोपार्जन में भी न्यायमार्ग की परवाह नहीं करता । जैसे एक ही जाति के बीज भिन्न-भिन्न प्रकार की भूमियों में बोये जाने पर भिन्न-भिन्न रूप में फलित होते हैं, वैसे ही एक ही शुभराग सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि आत्माओं के सम्पर्क से भिन्न-भिन्न फल देनेवाला हो जाता है। (६६) तात्पर्य यह कि यदि सांसारिक ऐश्वर्य जीवन का लक्ष्य है तो पूजा, भक्ति, व्रत, तप, यज्ञ आदि कर्मकाण्ड भी अधर्म ही बना रहता है और यदि आत्मा का सर्वोच्च स्वरूप जीवन का लक्ष्य होता है तो लौकिक क्रियाएँ भी अंशतः धर्म बन जाती हैं। इसी प्रकार लौकिक क्रियाओं का स्वरूप भी सम्यग्दृष्टि और For Private & Personal Use Only CC द्रव्यक्षेत्र अरुकाल है, भाव भव प्रतिबंध । जयन्तसेन उदय सभी जीव मात्र संबंध | www.jainelibrary.org
SR No.210657
Book TitleJain Darshan aur Dharm ka Bij
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherZ_Jayantsensuri_Abhinandan_Granth_012046.pdf
Publication Year
Total Pages2
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size2 MB
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