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________________ 628 श्री पुष्करमुनि अभिनन्दन ग्रन्थ : षष्ठम खण्ड Wreememorrearrrrrrrroomorrrrrrrrrorrorsemamritinoimmunmmarror सन्दर्भ एवं सन्दर्भ स्थल१ "ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्र" 2 जैन आगम साहित्य मनन और मीमांसा -देवेन्द्र मुनि 3 He who has a thorough knowledge of the structure of the world cannot but admire the in ward logic and harmony of Jain ideas. Hand in hand with the refined Cosmogrophical ideas goes a high standard of Astronomy and Mathematics. A History of Indian Astronomy is not Concievable without the famous "Surya Pragyapti" -Dr. Schubring 4 जैन आगम साहित्य : मनन और मीमांसा -लेखक देवेन्द्र मुनि, पृष्ठ 264 से 270 5. ता अवड्ढ पोरिसाधं छाया दिवसस्स कि गते सेसे वा ता तिमागे गए वा ता से से वा, पोरिसाणं छाया दिवस्स किं गए वा सेसे वा जाव चऊ भाग गए सेसे वा / -चन्द्रप्रज्ञप्ति प्र०६५ 6 स्थानांग, पृष्ठ 18 से 100 7 "एगमेगस्सणं चंदिम सूरियस्स अट्ठासीइ महम्गहा परिवारो।" -समवायांग संख्या 81-1 8 समवायांग :15-3 6 लग्गं च दक्षिणाय विसुवे सुवि अस्स उत्तरं अयणे / लग्गं साई विसुवेसु पंचसु वि दक्खिणे अयणे / / 10 विशेष विस्तार के लिए देखिए 'जैन ज्योतिष साहित्य : एक पर्यवेक्षण'-लेखक देवेन्द्र मुनि Mor-o-पुष्क र संस्म रण-----------------------0--0-0--0--0--0--0--0--0--0--2 सच्चा फोटो कई बार श्रद्धालु भक्तगण कहते हैं-गुरुदेव, हमें आपका फोटो चाहिए। आपके फोटो से हमें आध्यात्मिक प्रेरणा मिलेगी। गुरुदेव उन्हें कहते हैं-मेरे फोटो से क्या प्रेरणा लोगे ? मैं जिन्दा बैठा हूँ। मेरे में जो सद्गुण हैं उसे अपनाओ, यही मेरा सच्चा फोटो है / भयभीत मत बनो। मुझे पैसा और धन नहीं चाहिए / मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे में जो दुर्व्यसन है-तम्बाकू पीना, शराब पीना, तस्कर कृत्य करना, आदि जितनी भी बुराइयां उन्हें भेंट चढ़ा दो। किसानों ने गुरुदेव की बात सुनी / वे एक दूसरे से कहने लगे-बाबा तो बहुत देखे हैं, जो हमारे से पैसा मांगते हैं, भांग, चरस अफीम और तम्बाकू मांगते हैं / किन्तु 1 यह बाबा निराला है जो हमारे से दुर्गुणों की भेंट मांग रहा है। / उन्होंने गुरुदेव के कथन से प्रभावित होकर मद्य, मांस और तम्बाकू आदि व्यसनों। 1 का परित्याग कर दिया और यथासमय प्रतिदिन प्रमुस्मरण करने का भी नियम लिया / / a-o--0-0--0--0-0--0-0--0--0--0--0--0--0--0--0--0--0--0--0--0--0--0-0--0----5 8-0--0--0------0-0--0--0-0--0--0--0--0--o-rs Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.210646
Book TitleJain Jyotish Sahitya Ek Chintan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal
PublisherZ_Pushkarmuni_Abhinandan_Granth_012012.pdf
Publication Year
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jyotish
File Size719 KB
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