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________________ जैन छन्दशास्त्र परम्परा ४३५. . छन्दोऽनुशासन--कन्नड़ प्रदेश के निवासी दिगम्बर आचार्य जयकीति ने इस ग्रंथ की रचना की। कृति में आचार्य असंग के उल्लेख से ज्ञात होता है कि आपका समय लगभग १००० ई० के आसपास रहा होगा। छन्दोऽनुशासन के आठों अध्यायों में क्रमशः संज्ञा, समवृत्त, अर्धसमवृत्त, विषमवृत्त, जाति (मात्रिक छन्द), मिश्र, कन्नड़ के छन्द, एवं प्रस्ताव निरूपित हैं। इस ग्रन्थ की सबसे बड़ी विशेषतां वैदिक छन्दों के निरूपण के स्थान पर लोकभाषा कन्नड़ के छन्दों का निरूपण है । अनेक स्थलों पर कवि ने नये नामों का भी प्रयोग किया है। कवि ने प्रायः सभी लक्षणों को उसी छन्द में देने का प्रयास किया है ताकि पृथकशः उदाहरण देने की आवश्यकता न पड़े। छन्दःशेखर-ठक्कुर दुद्दक एवं नागदेवी के पुत्र राजशेखर ने इस ग्रन्थ की रचना की। इसकी प्राचीनतम प्रति वि० सं० ११७६ की मिली है। हेमचन्द्राचार्य ने इस कृति का उपयोग अपने ग्रन्थ में किया है । छन्दोऽनुशासन-षड्भाषा चक्रवर्ती आचार्य हेमचन्द्र ने जहाँ काव्य, व्याकरण एवं कोशों पर अपनी लेखनी चलाई, वहीं छन्दशास्त्र सम्बन्धी इस ग्रन्थ का प्रणयन भी किया। इसमें न केवल संस्कृत के अपितु प्राकृत, अपभ्रंश के छन्दों का वर्णन भी विस्तार के साथ किया है। आठ अध्यायों में विभक्त इस छन्दशास्त्रीय ग्रन्थ में चतुर्थ अध्याय में प्राकृत तथा पंचम से सप्तम तक के तीन अध्यायों में अपभ्रंश साहित्य में बहुप्रयुक्त छन्दों का विवरण मिलता है। शेष प्रथम में संज्ञा, द्वितीय में संस्कृत के समवृत्त एवं दण्डक तथा तृतीय में अर्धसम एवं विषम छन्दों का वर्णन प्राप्त होता है। आचार्य हेमचन्द्र को छन्दों के बहुत से नये प्रकरणों का ज्ञान था। दण्डक का विवरण देते हुए आपने ४११ विषम छन्दों में ७२ छन्दों का वर्णन किया है। उनके इस ग्रन्थ में कुल मिलाकर ८०० छन्दों का निरूपण है, जो अपने आप में बहुत बड़ी संख्या है। छन्दों के विषय में इतनी सुगम एवं विविधतापूर्ण कृति अन्यत्र दुर्लभ है। इस कृति पर स्वयं आचार्य हेमचन्द्र ने ही स्वोपज्ञ अथवा छन्दश्चूड़ामणि नाम से टीका लिखी। इस टीका में भरत, सैतव, पिंगल, जयदेव, काश्यप, स्वयंभू, सिद्धसेन, सिद्धराज कुमारपाल आदि का उल्लेख है। छन्दोरत्नावली-गुर्जर नरेश बीसलदेव की सभा के रत्न अमरचन्द्रसूरी जिनदत्तसूरी के शिष्य थे। अनेक ग्रंथों के रचयिता अमरचन्द्रसूरी ने ६०० श्लोकों में इस कृति की रचना की। __ इस कृति में नौ अध्याय हैं। अपने पूर्वाचार्यों की भांति इन्होंने भी अपनी कृति में प्राकृत छन्दों का विश्लेषण किया है । अद्यावधि अप्रकाशित इस ग्रंथ के प्रकाशन से शोधार्थियों को जानकारी प्राप्त होगी। छन्दोऽनुशासन—मेदपाट (मेवाड़) के जैन श्रेष्ठी नेमिकुमार के पुत्र महाकवि वाग्भट्ट ने १४वीं शती में इस ग्रंथ की रचना की। इसके पाँच अध्यायों में क्रमशः संज्ञा, समवृत्त, अर्धसमवृत्त, मात्रासमक एवं मात्रिक छन्दों का विवेचन है। वृत्तमौक्तिक-व्याकरण, काव्य, ज्योतिष, दर्शन एवं आध्यात्म की बहुमुखी प्रतिभाशाली उपाध्याय मेघविजय ने इस ग्रंथ की रचना की। १० पत्रों की इस लघुकाय कृति में कवि ने प्रस्तार संख्या, उद्दिष्ट, नष्ट आदि विषयों का विशद विवेचन तथा उपयोगी यंत्र (चार्टस) का निर्माण भी किया है। ऐसी मान्यता है कि सं० १७५५ में इस ग्रंथ की रचना भानुविजय के लिए की गई। समित्यर्थाश्वभू वर्षे प्रौढिरेषाऽभवत् श्रिये । भान्वादिविजयाध्यायहेतुतः सिद्धिमाश्रितः ।। छन्दोऽवतंस—केदार भट्ट के वृत्तरत्नाकार की शैली पर रचित इस रचना के प्रणेता उपाध्याय लालचन्द्रगणि हैं । संस्कृत भाषा में रचित इस ग्रंथ में अति उपयोगी छन्दों का विशद विश्लेषण कर शेष पर चलती दृष्टि डाली है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210637
Book TitleJain Chand Shastra Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNarottam Narayan Gautam
PublisherZ_Kesarimalji_Surana_Abhinandan_Granth_012044.pdf
Publication Year1982
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Kavya
File Size671 KB
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