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________________ समझौता नहीं किया और सदैव धार्मिक आधारों का सर्वश्रेष्ठ पट्ट चित्र माना जाता है। नाहटा कला कठोरतापूर्वक प.लन किया । भवन बीकानेर में भी इस प्रकार के सुन्दर वस्त्रचित्र सुरक्षित हैं। भारतीय चित्रकला के विकास में जैन कलाकारों ने अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। भारतीय चित्रकला जैन कलाप्रेमियों के कलात्मक दसवीं से पन्द्रहवीं शती के बीच का काल तो वस्तुओं की सुरक्षा के विशिष्ट गुण को भी विशेष शद्ध रूप से मुख्यत: जैन कला का ही काल रहा ऋणी है जिसके कारण चौदहवीं-पन्द्रहवीं शती के है। इस युग में पूर्व परम्परा को जीवित रखकर जिस क्रांतिमय समय में भी, जबकि अल्लाउद्दीन खिलजी निष्ठा और लगन के साथ जैन कलाकारों ने जैन जैसे सरदारों ने जहाँ भी हिन्द कलाकति देखी नष्ट शैली को विकसित किया और भविष्य में राजपूत करदी, जैन विद्वानों ने जी जान से अपनी कला परएवं मुगल शैली को जो नये प्रयोग एवं भाव म्परा या यों कहें कि तत्कालीन भारतीय कला परम्परा विधान दिये, उनके लिए भारतीय चित्रकला जैन । की रक्षा की। इन दिनों कागज के स्थान पर काश्मीरी चित्रकला की परम्परा की ऋणी है। तिब्बत, नेपाल कागज स्वर्णमयी एवं रजतमयी स्याही से मूल्यवान और गढ़वाल में कपड़े पर चित्रांकन की प्राचीन परम्परा चित्रों एवं पोथियों का निर्माण किया गया । मुनि के अनरूप भारतीय कला में वस्त्रों पर अंकन व लेखन कान्तिसागर के अनसार "कल्पसत्र" की एक प्रति, की सामग्री जैन कला में ही उपलब्ध होती है । श्रद्ध य जो अहमदाबाद में सुरक्षित है, इतने महत्व की प्रमामनि कांति सागर ने अपने एक गवेषणात्मक लेख में णित हो चुकी है कि उसका मल्य सवा लक्ष रुपये तक ताडपत्रों, वस्त्रों तथा कागजों आदि पर निर्मित जैन भी आँका जा चुका है। भारतीय नाट्य, संगीत और चित्रों, उनके चित्रकारों एवं ग्रन्थकारों का वृहद वर्णन चित्रकला तीनों ष्टियों में उम किया है। उनके संग्रह के अतिरिक्त लखनऊ, इलाहा- इन चित्रों में राग-रागिनी, मर्छना, तान आदि की बाद, कलकत्ता आदि के संग्रहालयों तथा योजना संगीत शास्त्र के अनुसार है, और आकाशचारी, अनेक व्यक्तिगत संग्रहों में वस्त्रचित्रों के मूल्यवान एवं पादचारी, मोमचारी, वगैरह भरतमुनि के "नाट्यदुर्लभ नमूने प्राप्त होते हैं । वाशिंगटन की फेयर आर्ट शास्त्र" में वर्णित नाट्य के विभिन्न रूप बड़े ही भाव गैलरी में सुरक्षित "वसंत विलास" नामक कृति (1508 पूर्ण हैं । प्रत्येक के मुखमुद्रा उनके हृदयगत भावों का वि. में लिखित) वस्त्र पर चित्रित विज्ञप्ति पत्रों की स्पष्टीकरण करते हुए विविध रूप उत्पन्न कर साधारण अपने ढंग की विश्व भर में चित्रकला में अद्वितीय कृति मानव को भी अपनी ओर आकृष्ट करती है यही उक्त मानी जाती है । ब्रिटिश म्यूजियम में भी जिनभद्रसूरि प्रति की कुछ विशेषताएँ हैं। के समय का जैन शास्त्रों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालने वाला एक बहुमूल्य एवं वृहत पट्ट चित्र आज भी जैन चित्रकारों द्वारा रंगों और रेखाओं के प्रति सुरक्षित है जिसे मुगल-राजपूत शैलियों से पूर्व का पूर्ण सजगता बरती गई है । इनका सबसे सुन्दर स्वरूप 5. "जैनों द्वारा पल्लवित चित्रकला" -- लेखक-मुनि कांतिसागर, “विशाल भारत" दिसम्बर 1947; भाग 40, अंक 6, पृष्ठ 341-348 । 6. तदैव । १९८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210636
Book TitleJain Chitrakala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUshakiran Jain
PublisherZ_Tirthankar_Mahavir_Smruti_Granth_012001.pdf
Publication Year
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Art
File Size666 KB
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