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________________ कर्म बन्ध-- और दुःख में असमर्थ है। यह जीव ईश्वर की प्रेरणा जैन दर्शन के अनुसार दोनों ही प्रकार के कर्मों से से स्वर्ग में या नरक में जाता है। जैन दर्शन के अनुउत्पन्न कर्माण विभिन्न कालावधियों के लिये मनुष्य को सार कर्म स्वयं अपना फल देते हैं, किसी के माध्यम से बांधकर रखते हैं। इस प्रकार कर्मबन्ध कर्म और आत्मा नहीं। इसी कारण कहा है कि उस कम से उत्पन्न किया के सम्बन्ध के परिणामस्वरूप उतान्न अवस्था है। यह जाने वाला सुख दुःख कर्मफल है 120 यह कर्मफल कर्म अवस्था कषाय एवं योग के कारण उत्पन्न होती है। की प्रकृति से प्रभावित होता है। जैन दर्शन के अनुसार आचार्य गृद्धपिच्छ ने कहा है कि7-- "जीव कषाय शुभ एव अशुभ भावों से किये गए कर्मों में जीव पर सहित होने के कारण कर्म के योग्य पुदगलों को ग्रहण अच्छा और बुरा प्रभाव डालने की शक्ति होती है, अतः करता हैं / इसी का नाम बन्ध है / शुद्ध आत्मा में कर्म इन भावों का प्रभाव कर्म परमाणुओं पर भी होता है, का बन्ध नहीं होता है, किन्तु कषायवान आत्मा ही और इसी के अनुसार वे कर्म अपने उदय के अवसर पर कर्म का वन्ध करता है। आचार्य जिन सेनाचार्य ने भी सदनुरूप सुख और दुःख प्रदान करते हैं। कर्मबन्ध की लगभग ऐसी ही व्याख्या करते हुए कहा इस प्रकार जैन दर्शन में कर्म सिद्धान्त की अत्यन्त है कि--"यह अज्ञानी जीव इष्ट और अनिष्ट संकल्प सक्ष्म एवं विषद तथा वैज्ञानिक विवेचना की गई है जो द्वारा वस्तु में प्रिय और अप्रिय की कल्पना करता है, यह बतलाती है कि मनुष्य स्वयं अपने कर्म का सष्टा इससे रागद्वेष उत्पन्न होता है और इस रागद्वेष से एवं भाग्य विधाता है। ईश्वर या अन्य कोई शक्ति न कर्म का बन्ध होता है, इस प्रकार रागद्वेष के निमित्त तो उसके कर्म को निर्धारित करती है. न ही उसके फल से संसार का चक्र चलता रहना है / 18 को। यही नहीं ईश्वरीय या अन्य कोई ऐसी शक्ति इस प्रकार रागद्वेष रूप भावकर्म का निमित्त उसे बरे कर्मों के उदय या फल भोगने से मुक्त भी पाकर द्वव्यकर्म आत्मा से बंधता है और द्रव्यकर्म के नहीं करा सकती। कर्मों से मुक्ति के लिये कर्ता द्वारा निमित्त से आत्मा में रागद ष रूपी भाव कम उत्पन्न स्वयं कर्मक्षय करना आवश्यक है। कर्मक्षय से कोई भी हाता ह। इन कमा स उत्पन्न परमाणु प्रत्यक समय जीव शुद्ध अवस्था अर्थात मूक्ति या मोक्ष को प्राप्त कर बंधते रहने से अनन्तानन्त होते हैं। यह बन्ध केवल सकता है। इसी कारण स्वामी कार्तिकेय ने कहा है कि जीवप्रदेश के क्षेत्रवर्ती कर्म परमाणुओं का होता है, न तो कोई लक्ष्मी देता है, और न कोई इसका उपकार बाहर के क्षेत्र में स्थित कर्म परमाणुओं का नहीं। करता है। शभ और अशभ कर्म ही जीव का उपकार आत्म प्रदेशों में होने वाला यह कर्मबन्ध प्रति समय होता है। यह सम्भव नहीं है कि किसी समय किन्हीं णय को बि देदि लच्छी ण को वि जीवस्स कुणई उवयार आत्म प्रदेशों के साथ बन्ध हो और किसी समय अन्थ उवयारं अवयारं कम्म पि सुहासुहं कूणदि // आत्मप्रदेशों के साथ / ---स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा 318 कर्मफल-ईश्वरवादी दर्शन ईश्वर को कर्म का फलदाता मानते हैं। उनके अनुसार यह अज्ञ प्राणी अपने सुख 17. सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान पुदगलानादत्ते स बन्धः / -तत्वार्थसूत्र 82 18. संकल्पवशो मूढः बस्त्विष्टा निष्टतां नयेत, रागद्वेर्षों ततस्ताभ्यां बन्धं दुर्मोचमश्नुते // महापुराण 24 // 21 19. अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुख दुःखयोः / ईश्वर प्रेरितो गच्छेत स्वर्ग वा श्वभ्रमेव वा // --महाभारत, वन पर्व 30128 20. तस्य कर्मणो यन्निष्पाद्य सुख दुःख तत्कर्म फलम / प्रवचनसार/त. प्र./१२४. 19. अशापरतो गच्छेत स्वर्ग वा तत्कर्म फलम / 140 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210615
Book TitleJain Karm Siddhanta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShyamlal Pandaviya
PublisherZ_Tirthankar_Mahavir_Smruti_Granth_012001.pdf
Publication Year
Total Pages6
LanguageHindi
ClassificationArticle & Karma
File Size584 KB
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