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________________ की है और अमरचन्द्र ने वत्ति । अमरचन्द्र ने अल. ड्रारमहोदधि के परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित हुआ है। कारप्रबोध की भी रचना की। अरिसिंह और अमर- इसमें आठ अध्याय हैं। प्रथम में काव्यफलहेतु, द्वितीय चन्द्र का समय त्रयोदश शताब्दी है। में शब्दार्थ, तृतीय में शब्दार्थदोष, चतुर्थ में गुण, पञ्चम में शब्दालङ्कार, षष्ठ में अर्थालङ्कार, सप्तम में रीति वाग्भट (द्वितीय) नामक एक अन्य जैन-आचार्य और अष्टम में रस का निरूपण हुआ है। इसकी श्लोकहुए हैं। ये वाग्भटालङ्कार के कर्ता वाग्भट से भिन्न सख्या 132 है। आठ अध्यायों में क्रमशः 5, 15, हैं। इनका समय सम्भवतः चतुर्दश शताब्दी है । इनके 24. 13. 13.49,5 और 8 श्लोक हैं। पिता का नाम नेमिकूमार था और का माता नाम वसुन्धरा । ये राधापुर में रहते थे । इन्होंने काव्यानुशासन की मन्त्रिमण्डन श्रीमाल वंश में उत्पन्न हुए थे। इनका रचना की।"काव्यानुशासन वाग्भट की अलङ्कारतिलक समय विक्रमीय पन्द्रहवीं शताब्दी है। इन्होंने अलङ्कारटीका के साथ निर्णयसागर से प्रकाशित हो चुका है। मण्डन नामक ग्रन्थ की रचना की। इसमें पाँच परिच्छेद हैं । काव्यमण्डन-चम्पूमण्डन-शङ्गारमण्डन-सङ्गीतमन्डनइसके सूत्र गद्य में हैं । यह ग्रन्थ पाँच अध्यायों में सारस्वतमण्डन-कादम्बरीमण्डन-चन्द्रविजय आदि भी विभक्त है । प्रथम में काव्यप्रयोजन, काव्यहेतु, द्वितीय में दोष-गुण, तृतीय में अर्थालङ्कार, चतुर्थ में शब्दा इनकी रचनाएं बतलायी जाती हैं। लङ्कार तथा पञ्चम में रस, नायक-नायिकाओं के प्रकार और रस-दोषों का विवेचन हआ है। वाग्भट ने अपनी अणुरत्नमण्डन या रत्नमण्डनगणि (15वीं शताब्दी) टीका में विभिन्न प्रदेशों, नदियों, वक्षों और अनेक . ने कविशिक्षाविषयक ग्रन्थ 'जल्पकल्पलता' की रचना की। इनकी अन्य कृति मुग्धमेधाकर है, जिसमें मुख्य विशिष्ट वस्तुओं का स्थल-स्थल पर उल्लेख किया है। इन्होंने छन्दोऽनुशासन तथा ऋषभदेवचरित की भी र ___ रूप से अलङ्कारों का विवेचन किया गया है। रचना की थी। जयमकलाचार्य-कृत कविशिक्षा और आचार्य भावदेवसूरि ने काव्यालङ्कारसार नामक लघुकाय विनयचन्द्र-कृत कविशिक्षा में कवियों के लिए आवश्यक ग्रन्थ की रचना की । यह नरेन्द्रप्रभसूरि-विरचित अल- निर्देशों का प्रतिपादन हुआ है । 15. अलङ्कारमहोदाधि की प्रस्तावना; पृ. 20 । 16, 17. 'नव्यानेकमहाप्रबन्धरचनाचातुर्य विस्फजित स्फारोदारयशः प्रचारसततव्याकीर्णबिश्वत्रयः । श्रीमन्नेमिकुमारसूनुरखिलप्रज्ञालुचूडामणिः काव्यानामनुशासनं वरमिदं चक्र कविर्वाग्भटः ।। काव्यानुशासन (निर्णयसागर सं., 1915 ई0) का अन्तिम श्लोक । 18. कृष्णमाचार्य, हिस्ट्री ऑफ क्लैसिकल संस्कृत लिटरेचर, पृ. 7641 19. अलङ्गारमहोदधि की प्रस्तावना। 20. कृष्णमाचार्य, हिस्ट्री ऑफ क्लैसिकल संस्कृत लिटरेचर, 4 780 । २५३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210593
Book TitleJain Acharyo ka Sanskrut Kavya Shastra me Yogadan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarnath Pandey
PublisherZ_Tirthankar_Mahavir_Smruti_Granth_012001.pdf
Publication Year
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Kavya
File Size568 KB
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