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________________ वही विद्या महाविद्या है और वही विद्या समस्त विद्याओं में विभिन्न दृष्टियों से विवेचना की गयी है। यदि उस समग्र विवेचना उत्तम है, जिसकी साधना करने से समस्त दुःखों से मुक्ति मिलती को एक ही वाक्य में कहना हो तो जैन आचार्यो की दृष्टि में है। विद्या दुःख मोचनी है। जैन आचार्यों ने उसी विद्या को उत्तम शिक्षा का प्रयोजन चित्तवृत्तियों एवं आचार की विशुद्धि है। माना है जिसके द्वारा दुःखों से मुक्ति हो और आत्मा के शुद्ध चित्तवृत्तियों का दर्शन ज्ञान-यात्रा का प्रारम्भ है। आचारांग में मैं स्वरूप का साक्षात्कार हो। कौन हूँ? इसे ही साधना-यात्रा का प्रारम्भ बिन्दु कहा गया है। अब प्रश्न यह उपस्थित है कि दु:ख क्या है और किस आचारांग ही नहीं सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में आत्म-जिज्ञासा से दु:ख से मुक्त होना है? यह सत्य है कि दुःख से हमारा तात्पर्य ही ज्ञान-साधना का प्रारम्भ माना गया है, उपनिषद का ऋषि दैहिक दुःखों से भी होता है, किन्तु ये दैहिक दुःख प्रथम तो कभी कहता है “आत्मानं विद्धि', आत्मा को जानो। बुद्ध ने भी पर्णतया समाप्त नहीं होते क्योंकि उनका केन्ट हमारी चेतना “अत्तानं" कहकर इसी तथ्य की पुष्टि की। ज्ञातव्य है कि यहाँ न होकर हमारा शरीर होता है। जैन परम्परा के अनुसार तीर्थंकर आत्मज्ञान का तात्पर्य अमूर्त आत्म तत्व की खोज नहीं, अपितु अपनी वीतराग दशा में भी दैहिक दु:खों से पर्णत: मक्त नहीं हो अपने ही चित्त की विकृतियों और वासनाओं का दर्शन है। सकता। जब तक देह है क्षुधा, पिपासा आदि दु:ख तो रहेंगे ही। चित्तवृत्ति और आचार की विशुद्धि की प्रक्रिया तब ही प्रारम्भ हो अत: जिस दुःख से विमुक्ति प्राप्त करनी है, वे दैहिक नहीं सकती है, जब हम अपने विकारों और वासनाओं को देखें, मानसिक है। व्यक्ति की रागात्मकता, आसक्ति या तृष्णा ही एक क्योंकि जब तक चित्त में विकारों, वासनाओं और उनके कारणों ऐसा तत्व है, जिसकी उपस्थिति में मनुष्य दुःखों से मुक्ति प्राप्त के प्रति सजगता नहीं आती तब तक चरित्र शुद्धि की प्रक्रिया नहीं कर पाता है। इससे स्पष्ट होता है कि जैन आचार्यों की दृष्टि प्रारम्भ ही नहीं हो सकती। आचारांग में ही कहा गया है कि जो में शिक्षा का प्रयोजन मात्र रोजी-रोटी प्राप्त कर लेना नहीं रहा मन का ज्ञाता होता है, वही निर्ग्रन्थ (विकार-मुक्त) है।"५ है। जो शिक्षा व्यक्ति में आध्यात्मिक आनन्द या आत्मतोष नहीं जैन आचार्यों की दृष्टि में उस शिक्षा या ज्ञान का कोई अर्थ दे सकती, वह शिक्षा व्यर्थ है। आत्मतोष ही शिक्षा का सम्यक् नहीं है जो चारित्र शुद्धि या आचार शुद्धि की दिशा में गतिशील प्रयोजन है। शिक्षा-पद्धति स्पष्ट करते हुए “इसिभासियाई" में न करता हो, इसीलिए सूत्रकृतांग में स्पष्ट रूप से कहा गया है कहा गयाहै कि जिस प्रकार एक योग्य चिकित्सक सर्वप्रथम रोग कि "विज्जाचरणं पमोक्ख'६ अर्थात् विद्या और आचरण से ही को जानता है फिर उस रोग के कारणों का निश्चय करता है, विमुक्ति की प्राप्ति होती है। उत्तराध्ययनसूत्र में शिक्षा के प्रयोजन फिर रोग की औषधि का निर्णय करता है और फिर उस औषधि को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि श्रुत की आराधना से जीव द्वारा रोग की चिकित्सा करता है। उसी प्रकार हमें सर्वप्रथम अज्ञान का क्षय करता है और संक्लेश को प्राप्त नहीं होता। मनुष्यों के दु:ख के स्वरूप को समझना होता है, तत्पश्चात् दुःख इसे और स्ष्ट करते हुए इसी ग्रन्थ में पुन: कहा गया है कि जिस के कारणों का विश्लेषण करके फिर उन कारणों के निराकरण प्रकार धागे से युक्त सुई गिर जाने पर भी विनष्ट नहीं होती है का उपाय खोजना होता है और अन्त में इन उपायों द्वारा उन अर्थात् खोजी जा सकती है, उसी प्रकार श्रुत सम्पन्न जीव संसार कारणों का निराकरण किया जाता है। यही बातें जैन धर्म में में विनष्ट नहीं होता। इसी ग्रन्थ में अन्यत्र यह भी कहा गया है शिक्षा के प्रयोजन एवं पद्धति को स्पष्ट करती है। सम्यक् शिक्षा कि ज्ञान, अज्ञान और मोह का विनाश करके सर्व विषयों को वही है जो मानवीय दु:खों के स्वरूप को समझे, उनके कारणों प्रकाशित करता है। यह स्पष्ट है कि ज्ञान-साधना का प्रयोजन का विश्लेषण करे फिर उनके निराकरण के उपाय खोजे और अज्ञान के साथ-साथ मोह को भी समाप्त करना है। जैन आचार्यों उन उपायों का प्रयोग करके दुःखों से मुक्त हो। वस्तुत: आज की दृष्टि में अज्ञान और मोह में अन्तर है। मोह अनात्म विषयों की हमारी जो शिक्षा नीति है, उसमें हम इस पद्धति को नहीं के प्रति आत्म बुद्धि है, वह राग या आसक्ति का उद्भावक है अपनाते। शिक्षा से हमारा तात्पर्य मात्र बालक के मस्तिष्क को उसी से क्रोध, मान, माया और लोभ इन चारों कषायों का जन्म सूचनाओं से भर देना है। जब तक उसके सामने जीवन-मूल्यों होता है। अत: उत्तराध्ययन के अनुसार जो व्यक्ति की क्रोध, को स्पष्ट नहीं करते, तब तक हम शिक्षा के प्रयोजन को न तो मान, माया आदि की दूषित चित्त वृत्तियों पर अंकुश लगाये, वही सम्यक् प्रकार से समझ ही पाते हैं न मनुष्य के दु:खों का सच्ची शिक्षा है।१० केवल वस्तुओं के सन्दर्भ में जानकारी प्राप्त निराकरण ही कर पाते है। जैन आगमों में ऋषिभाषित एवं कर लेना शिक्षा का प्रयोजन नहीं है। उसका प्रयोजन तो व्यक्ति आचारांग से लेकर प्रकीर्णकों तक में शिक्षा के उद्देश्य की को वासनाओं और विकारों से मुक्त कराना है। शिक्षा व्यक्तित्व ० अष्टदशी / 920 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210580
Book TitleJain Agamo me Mulyatmaka Shiksha aur Vartaman Sandarbh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Ashtdashi_012049.pdf
Publication Year2008
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size773 KB
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