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________________ [२३ જૈન આગમધર ઔર પ્રાકૃત વાલ્મય कित्ती कंतिपिणद्धो जसपत्तपडहो (2) तिसागरणिरुद्धो। पुणरुत्तं भमति महि ससि व्व गगणंगणं तस्स ॥२॥ तस्स लिहियं णिसीहं धम्मधुराधरणपधरपुजस्स । आरोगधारणिज्जं सिस्स-पसिस्सोवभोज्जं च ॥३॥ दिगम्बर परम्परामें श्वलाके अनुसार १४ अंगबाह्य अर्थाधिकार हैं. इनमें कल्प और व्यवहारको एक माना गया है तथा निशीथको अलग स्थान दिया गया है. इससे यह तो स्पष्ट होता है कि कल्प, व्यवहार और निशीथकी अंगबाह्य अर्थाधिकारकी परम्परा चली आती थी. भद्रबाहुकृत कल्प-व्यवहार जिस रूपमें आज श्वेताम्बर परम्परामें मान्य है उसी रूपमें दिगम्बर परम्परामें उल्लिखित अंगबाह्य कल्पादि मान्य थे या उससे भिन्न-यह निश्चयपूर्वक कहना कठिन है, किन्तु उनका जो विषय बताया गया है यही विषय उपलब्ध भद्रबाहुकृत कल्पादिमें विद्यमान है. दोनों परम्पराओंके मतसे स्थविरकृत रचनाएं अंगबाह्य मानी जाती रही हैं. भद्रबाहु तक श्वेताम्बर दिगम्बरका मतभेद स्पष्ट नहीं था. इन तथ्योंके आधार पर संभावना की जा सकती है कि कल्प-व्यवहारके जिन अर्थाधिकारों का उल्लेख धवलामें है उन अर्थाधिकारोंका सूत्रात्मक व्यवस्थित संकलन सर्वप्रथम आचार्य भद्रबाहुने किया और वह संघको मान्य हुआ. इस दृष्टिसे धवलामें उल्लिखित कल्प-व्यवहार और निशीथ तथा उपलब्ध कल्प-व्यवहार और निशीथमें भेद माननेका कोई कारण नहीं है. फिर भी दोनोंकी एकताका निश्चयपूर्वक विधान करना कठिन है. आचार्य भद्रबाहु की जो विशेषता है वह यह है कि इन्होंने अपने उक्त ग्रंथोंमें उत्सर्ग और अपवादोंकी व्यवस्था की है. इतना ही नहीं किन्तु व्यवहारसूत्रमें तो अपराधोंके दण्डकी भी व्यवस्था की गई है. ऐसी दण्डव्यवस्था एवं आचार्य आदि पदवीकी योग्यता अदिके निर्णय सर्वप्रथम इन्हीं ग्रंथों में मिलते हैं. संघने ग्रंथोंको प्रमाणभूत माना यह आचार्य भद्रबाहुकी महत्ताका सूचक है. श्रमणोंके आचार के विषयमें दशवैकालिकके बाद दशा-कल्प आदि ग्रंथ दूसरा सीमास्तम्भ है. साथ ही एक वार अपवादकी शुरूआत होने पर अन्य भाष्यकारों व चूर्णिकारोंने भी उत्तरोत्तर अपवादोंमें वृद्धि की. संभव है कि इसी अपवाद-मार्गको लेकर संघमें मतभेदकी जड़ दृढ होती गई और आगे चल कर श्वेताम्बर-दिगम्बरका सम्प्रदाय-भेद भी दृढ हुआ. बृहत्कल्प भा० ६की प्रस्तावनामें मैंने अनेक प्रमाणोंके आधार पर यह सिद्ध किया है कि उपलब्ध नियुक्तियोंके कर्ता श्रुतकेवली भद्रबाहु नहीं है किन्तु ज्योतिर्विद् वराहमिहिरके भ्राता । द्वितीय भद्रबाहु हैं जो विक्रमकी छठी शताब्दीमें हुए हैं. अपने इस कथनका स्पष्टीकरण करना यहाँ उचित है. जब मैं यह कहता हूं कि उपलब्ध नियुक्तियाँ द्वितीय भद्रबाहुकी हैं, श्रुतकेवली भद्रबाहुकी नहीं तब इसका तात्पर्य यह नहीं कि श्रुतकेवली भद्रबाहुने नियुक्तियोंकी रचना की ही नहीं. मेरा तात्पर्य केवल इतना ही है कि जिस अन्तिम संकलनके रूपमें आज हमारे समक्ष नियुक्तियाँ उपलब्ध Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210571
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherPunyavijayji
Publication Year1969
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size3 MB
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