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________________ જૈન આગમઘર ઔર પ્રાકૃત વાલ્મય [२१ विचरने वाले आचार्योंका उल्लेख मिलता है. कल्पचूर्णि एवं निशीथचूर्णिमें (भाग २ पत्र० १३४) भी लाटाचार्यका उल्लेख प्राप्त होता है. यहाँ लाटदेश भगवान् महावीरके विहारमें वर्णित लाढदेश नहीं, किन्तु गुजरातमें महीनदी और दमणके बीचके प्रदेशको समझना चाहिए, जिसके प्रमुख नगर भृगुकच्छ (भरुच) और दर्भावती (डभोई) आदि थे. भारतीय विद्याभवनके आचार्य पद्मश्री मुनि जिनविजयजी सम्पादित पुस्तकप्रशस्ति संग्रह पृष्ठ १०७ प्रशस्तिक्रमांक ६९ आदिमें " श्री वोसरि लाटदेशमण्डले महीदमुनयोरन्तराले समस्तव्यापारान् परिपन्थयति" इत्यादि उल्लेख भी पाये जाते हैं. जिनागमविषमपदपर्यायमें पंचकल्पके विषमपदपर्यायमें "लाडपरिवाडीए लाडवाचनायामित्यर्थः" ऐसा उल्लेख है. इसी प्रकार इसी ग्रन्थमें निशीथसूत्रके विषमपदपर्यायमें "लाडाचार्याभिप्रायात् . माधुराचार्याभिप्रायेण परओ राईए चिन्ताऽस्माकम्” इस तरह माथुराचार्यका भी उल्लेख पाया जाता है. इसी तरह षट्खण्डागमकी धवला टीकामें उत्तरपतिपत्ति व दक्षिणप्रतिपत्ति रूपसे जो दो प्रकारकी प्रतिपत्तियों का उल्लेख है वह भी मूलतः तत्तत्प्रदेशके आचार्योको विशेष रूपसे मान्य होने वाली परम्पराका ही निर्देश है (षट्खण्डागम भा० १ भूमिका पृ० ५७ तथा भा० ३ भूमिका पृ० १५). धवलाकारने इनका जो अर्थ किया है वह इस प्रकार है ; “ एसा दक्षिणपडिवत्ती । दक्खिणं उज्जुवं आयरियपरम्परागदमिदि एयट्ठो .............एसा उत्तरपडिवत्ती। उत्तरमणुज्जुवं आयरियपरम्पराए णागदमिदि एयट्ठो॥" - षट्खण्डागमः धवला, भा० ५, पृ० ३२ इससे प्रतीत होता है कि धवलाकारके समक्ष दक्षिणप्रतिपत्तिकी मान्यता परम्परागत थे। जब कि उत्तरप्रतिपत्ति परम्परागत नहीं थी. (४) पांच सौ आदेशोंके स्थापक - स्थविर आर्य भद्रबाहुस्वामीने आवश्यकनियुक्तिकी १०२३वीं गाथामें “पंचसयादेसवयणं व" इस गाथांशसे पांच सौ आदेशों का निर्देश किया है. आवश्यकचूर्णिकार श्री जिनदासमहत्तर तथा वृत्तिकार श्री हरिभद्रसूरिने “ पांच सौ आदेश "के विषयमें लिखा है ; “ अरिहप्पवयणे पंच आदेससताणि. ण वि अंगे ण वि उवंगे पाढो अस्थि एवं-मरुदेवा अणादि-वणस्सइकाइया अणंतरं उच्चट्टित्ता सिद्ध त्ति १। तहा सयंभूरमणमच्छाण पउमपत्ताण य सव्वसंठाणाणि वलयसंठाणं मोत्तुं २। करड-उक्करडा य कुणालाए एते जधा तधा भणामि - करडउक्करडाण निगमणमूले वसही, देवयाणुकंपगं, रुद्रुसु पनरसदिवसवरिसणं कुणालाणगरिविणासो, ततो ततियवरिसे साएए णगरे दोण्ह वि कालकरणं, अहेसत्तमपुढवि कालणरगगमणं, कुणालाणगरिविणासकालाओ तेरसमे वरिसे महावीरस्त केवलनाणुप्पत्ती ३. एयं अबद्धं." (आवश्यकचूर्णि भा० १ पृष्ठ ६०१; हरिभद्रवृत्तिपत्र ४६५) अर्थात् जिन हकीकतोंका उल्लेख किसी अंग या उपांग आदिमें नहीं मिलता है किन्तु जो स्थविर आचार्योंके मुखोपमुख चली आई हैं उनका संग्रह " पाच सौ आदेश" कहलाता है. इन पांच सौ मादेशोंका कोई संग्रह आज उपलब्ध Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210571
Book TitleJain Agamdhar aur Prakrit Vangamaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherPunyavijayji
Publication Year1969
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size3 MB
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