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________________ प्रकार से विवेचित करते हैं / सत्य तो 'अंधों का हाथी' है / आज बालों के लुंचन से कोई श्रमण नहीं बन जाता, मात्र 'ॐ' का जाप के 'धार्मिक - असहिष्णुता एवं साम्प्रदायिकता - संकीर्णता' के युग करने से कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता, बन में निवास करने से कोई में जैनधर्म का 'स्याद्वाद' का सिद्धांत एक उपयोगी जीवन-मूल्य मुनि नहीं बन जाता और वल्कल पहनने से कोई तापस नहीं बन हो सकता है। जाता :जैन धर्म में विवेचित महाव्रत, मानव के सनातन जीवन-मूल्य न वि मुंडिएण समणो, न ओंकारेण बंमणो / हैं / इनमें एक जीवन-मूल्य 'कर्म का सिद्धान्त' मनुष्य को कर्म की न मुणी वण्णवासेण, कुसचीरेण न तावसो // सतत प्रेरणा देता है / हम अपने दुःख-सुख के कर्ता स्वयं है / भाग्य इसमें, बीच में कहाँ आता है / ईश्वर, हमारी अनुकूल अतएव, सच्चा धर्म तो 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' का दूसरा नाम है। प्रतिकूल परिस्थितियों एवं द्वंद्वात्मक स्थितियों का रचनाकार नहीं प्राणिमात्र में प्रेम का भाव देखना ही धर्म है। रुद्राक्ष, तुलसीमाला, है / स्वर्ग, नरक, दुःख-सुख हमारे कर्मों के ही फल हैं / इसलिए त्रिपुण्ड्र, भस्मलेप, तीर्थयात्रा, पवित्रस्नान, जप, देवदर्शन मनुष्य में हमें सुकर्मों में ही प्रवृत्त होना चाहिए / हमें कर्मरत होकर जीवन वह पवित्रता नहीं ला सकते जो प्राणिमात्र में 'एकात्म' भाव देखने जीना चाहिए न कि अपनी सभी स्थितियों को ईश्वर या भाग्य के से आती है: मत्थे मढ़ देना चाहिए / उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है : रुद्राक्ष, तुलसीकाष्ठं, त्रिपुण्ड्रं, भस्मधारणम् अप्पा कत्ता विकत्ताय दुहाणय सुहाणय, यात्राः, स्नानानि होमाश्च जपाः वा देवदर्शनम् अप्पा मित्तं ममित्तं य, दुपट्ठिय, सुपट्ठिय / / मग पुनन्त्येतेन मनुजं यथा भूतहिते रतिः // व्यक्ति स्वयं अपने दुःख व सुख का कर्ता है / वह स्वयं ही कहने का तात्पर्य है कि हमारे जीवन-मूल्य मात्र सांस्कारिकअपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है / यही भाव गीता में औपचारिकताएँ न बन जायें, उनमें व्यवहार की प्राण-प्रतिष्ठा होना भी आया है / व्यक्ति अपना उद्धार स्वयं करे / कर्म का यह बहुत आवश्यक है / जैन-धर्म में सामान्यतः मन-वचन-कर्म का सिद्धान्त जीवन की कर्मठता का पोषक है / यह जीवन-मूल्य हमें अच्छा समीकरण मिलता है / इसी गुणवत्ता के कारण कहा गया पलायनवादी होने से रोकता है / जो व्यक्ति भाग्याधीन होकर कर्म- है:विमुख बैठे रहते हैं, उन्हें इस जीवन-मूल्य से प्रेरणा ग्रहण करनी स्याद्वादो वर्ततेयस्मिन्, पक्षपातो न विद्यते / चाहिए। नास्त्यन्यपीडनं यत्र, जैनधर्मः स उच्यते // अंत में यह बताना परमावश्यक है कि 'धर्म' कोई मात्र अनुष्ठान, परिपाटी, रूढ़ि नहीं है और न यह कोई उत्सवों या पर्वो जैनधर्म में अन्तर्ग्रथित जीवन-मूल्य, समता, अपरिग्रह, अहिंसा, का रंगमंच है। आंतरिक परिवर्तन का ही दसरा नाम धर्म है। अनेकांत, सम्यक्दर्शन, सम्यकूज्ञान व सम्यकूचारित्र जैसे उच्चादशी इसलिए जीवन-मूल्यों का सही अर्थ तभी समझा जा सकेगा जब की भूमि पर अवस्थित हैं / इन जीवन-मूल्यों के मन-वचन-कर्म के कि वे हमारे आंतरिक-परिवर्तन की प्रक्रिया के अंग बन जायें / सुन्दर समन्वय से ही मानव का कल्याण सभव है मधुकर-मौक्तिक इस भव-अटवी में यह जीव-रूपी मुसाफिर भटका हुआ है / कर्म-चोर ने उसका आत्म-धन छीन लिया है और उसे अन्धा बना दिया है | वह होश में भी नहीं है। ऐसे समय में उस भले आदमी के सामने श्री अरिहंत परमात्मा सब से पहले उसे अभय दान करते हैं, जिससे उसका भय भाग जाता है, फिर वे उसकी आँखों पर लगे अज्ञान के पर्दे को दूर कर उसे चक्षुदान करते है / वे उसे मार्ग दिखाते है / उसे मुक्ति के पथ की ओर अग्रसर करते हैं / उसे शरण देते हैं और उसका मोह दूर कर उसे आत्मज्ञान देते हैं / यह अरिहंत परमात्मा का इस जगत् के जीवों पर सब से बड़ा उपकार है। उन्होंने संसार के प्राणियों को दुःख-मुक्ति और सुख प्राप्ति का मार्ग बताया, इसीलिए हमें उनके प्रति कृतज्ञ रहना है और उनका गुणगान करना है। - जैनाचार्य श्रीमद् जयंतसेनसूरि 'मधुकर' इस संसार में सब स्वार्थ के सगे हैं। इस बात का अनुभव मनुष्य को कब होता है ? जब मनुष्य चारों ओर से निराश हो जाता है, तब कहता है कि सब लोग स्वार्थी हैं | स्वारथ के सब ही सगे बिन स्वारथ नहीं कोय' - यह बात सबसे पहले किसने बतायी ? अरिहंत परमात्मा ने / पर हमें इस बात का अनुभव तब होता है, जब हम संकट में फँस जाते हैं और सब हमारा साथ छोड़ देते हैं। - जैनाचार्य श्रीमद् जयंतसेनसूरि 'मधुकर' श्रीमद् जयन्तसेनसूरि अभिनन्दन ग्रंथ / विश्लेषण (65) ढोल बजाओ मत कभी, अगर सुनो कुछ बात / जयन्तसेन तथ्य समझ, कभी न हो उत्पात // www.jainelibrary.org Jain Education International For Private & Personal Use Only
SR No.210553
Book TitleJivan Mulya tatha Jain Dharm
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNarendra Sharma
PublisherZ_Jayantsensuri_Abhinandan_Granth_012046.pdf
Publication Year
Total Pages3
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ethics
File Size3 MB
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