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________________ माना जा सकता है। यह बात पूर्व में स्पष्ट की जा चुकी है। प्रकति में कर्मों के आस्रव और बन्ध तथा संवर और निर्जरा की प्रक्रिया १. अभव्य और भव्य मिथ्यादृष्टि जीव जब तक आसक्तिवश मानसिक, वाचनिक और कायिक संकल्पी पापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति करते रहते हैं तब तक वे उस प्रवृत्ति के आधार पर सतत कर्मों का आस्रव और बन्ध ही किया करते हैं, तथा उस संकल्पीपापमय अशुभ प्रवृत्ति के साथ वे यदि कदाचित् सांसारिक स्वार्थवश मानसिक, वाचनिक और कायिक पुण्यमय दयारूप शुभ प्रवृत्ति भी करते हैं, तो भी वे उन प्रवृत्तियों के आधार पर सतत कमा का आस्रव और बन्ध भी किया करते हैं। २. अभव्य और भव्य मिथ्यादृष्टि जीव जब आसक्तिवश होने वाले संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति के साथ मानसिक, वाचनिक और कायिक पुण्यमय दयारूप शुभ प्रवृत्ति को कर्तव्यवश करने लगते हैं, तब भी वे कर्मों का आस्रव और बन्ध ही किया करते हैं। ३. अभव्य और भव्य मिथ्यादृष्टि जीव उक्त संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति का मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति के रूप में सर्वथा त्याग कर यदि आसक्तिवश होने वाले मानसिक, वाचनिक और कायिक आरम्भीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति के साथ कर्तव्यवश मानसिक, वाचनिक और कायिक पुण्यमय दयारूप शुभ प्रवृत्ति करने लगते हैं, तो भी वे कर्मों का आस्रव और बन्ध ही किया करते हैं। ४. अभव्य और भव्य मिथ्यादृष्टि जीव यदि उक्त संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति के उक्त प्रकार सर्वथा त्यागपूर्वक उक्त आरम्भी पापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति का भी मनोगुप्ति, बचनगुप्ति और कायगुप्ति के रूप में एकदेश अथवा सर्वदेश त्याग कर कर्तव्यवश मानसिक, वाचनिक और कायिक पुण्यमय दयारूप शुभ प्रवृत्ति करने लगते हैं, तो भी वे कर्मों का आस्रव और बन्ध ही किया करते हैं। ५. अभव्य और भव्य मिथ्यादृष्टि जीव उक्त संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति का सर्वथा त्यागकर उक्त आरम्भी पापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति के साथ कर्तव्यवश पुण्यमय दयारूप शुभ प्रवृत्ति करते हुए अथवा उक्त संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति का सर्वथा व उक्त आरम्भी पापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति का एकदेश या सर्वदेश त्याग कर कर्तव्यवश पुण्यमय शुभ प्रवृत्ति करते हुए यदि क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना और प्रयोग्य लब्धियों का अपने में विकास कर लेते हैं, तो भी वे कर्मों का आस्रव और बन्ध ही किया करते हैं। ६. यत: मिथ्यात्व गुणस्थान के अतिरिक्त सभी गुणस्थान भव्य जीव के ही होते हैं, अभव्य जीव के नहीं, अतः जो भव्य जीव सासादन सम्यग्दृष्टि हो रहे हों, उनमें भी उक्त पांचों अनुच्छेदों में से दो, तीन और चार संख्यक अनुच्छेदों में प्रतिपादित व्यवस्थाएँ यथायोग्य पूर्व संस्कारवश या सामान्यरूप से लागू होती हैं, तथा अनुच्छेद तीन और चार में प्रतिपादित व्यवस्थाएँ मिथ्यात्व गुणस्थान की ओर झुके हुए सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों में भी लागू होती हैं। सासादन सम्यग्दृष्टि जीवों में अनुच्छेद एक में प्रतिपादित व्यवस्था इसलिए लागू नहीं होती कि वे जीव एक तो केवल संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति कदापि नहीं करते हैं व उनकी प्रवृत्ति अबुद्धिपूर्वक होने के कारण वे पुण्यमय दयारूप प्रवृत्ति भी सांसारिक स्वार्थवश नहीं करते हैं, तथा उनमें अनुच्छेद पांच में प्रतिपादित व्यवस्था इसलिए लागू नहीं होती कि वे अपना समय व्यतीत करके नियम से मिथ्यात्व गुणस्थान को ही प्राप्त करते हैं। इसी तरह मिथ्यात्व गुणस्थान की ओर झुके हुए सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों में अनुच्छेद एक और दो में प्रतिपादित व्यवस्थाएँ इसलिए लागू नहीं होती कि उनमें सफल्मी पापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति का सर्वथा अभाव रहता है तथा उनमें अनुच्छेद पांच की व्यवस्था इसलिए लागू नहीं होती कि वे भी मिथ्यात्व गुणस्थान की ओर झुके हुए होने के कारण अपना समय व्यतीत करके मिथ्यात्व गुणस्थान को ही प्राप्त करते हैं । इस तरह सासादन सम्यग्दृष्टि और मिथ्यात्व गुणस्थान की ओर झुके हुए सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सतत यथायोग्य कर्मों का आस्रव और बन्ध ही किया करते हैं। यहां यह ध्यातव्य है कि सासादन सम्यग्दृष्टि जीवों के साथ सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों की प्रवृत्तियां भी अबुद्धिपूर्वक हुआ करती हैं। ७. उपर्युक्त जीवों से अतिरिक्त जो भव्य मिथ्यादृष्टि जीव और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सम्यक्त्व-प्राप्ति की ओर झुके हुए हों अर्थात् सम्यक्त्व-प्राप्ति में अनिवार्य कारणभूत करणलब्धि को प्राप्त हो गये हों, वे नियम से यथायोग्य कर्मों का आस्रव और बन्ध करते हुए भी दर्शनमोहनीय कर्म की यथासम्भव रूप में विद्यमान मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति रूप तीन तथा चारित्र मोहनीय कर्म के प्रथम भेद अनन्तानुबन्धी कषाय की नियम से विद्यमान-क्रोध, मान, माया और लोभ-रूप चार-इस तरह सात कर्म-प्रकृतियों का उपशम, क्षय या क्षयोपशम रूप में संवर और निर्जरण किया करते हैं। इसी तरह चतुर्थ गुणस्थान से लेकर आगे के गुणस्थानों में विद्यमान जीव यथायोग्य कर्मों का आस्रव और बन्ध, यथायोग्य कर्मों का संबर और निर्जरण किया करते हैं। उपर्युक्त विवेचन का फलितार्थ १. कोई अभव्य और भव्य मिथ्यादष्टि जीव संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति ही किया करते हैं । अथवा संकल्पीपापमय अदयारूप अशुभ प्रवृत्ति के साथ सांसारिक स्वार्थवश पुण्यमय दयारूप शुभ प्रवृत्ति भी किया करते हैं। कोई अभव्य और भव्य मिथ्यादृष्टि जैन धर्म एवं आचार ४३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210546
Book TitleJivdaya ka Vishleshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Pandit
PublisherZ_Deshbhushanji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012045.pdf
Publication Year1987
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Religion
File Size989 KB
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