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________________ इस संवेगरंगशाला के कर्ता ने अन्त में १००२६ गाथा भगवान् श्रेष्ठ श्रीवर्धमानसूरिजी हुए। उनके व्यवहारनय से अपनी परम्परा का वंशवृक्ष सूचित किया है। उसमें और निश्चयनय जैसे अथवा द्रव्यस्तव और भावस्तव जैसे चौवीसवें तीर्थकर भगवान महावीर के अनन्तर सुधर्मा धर्म की परम उन्नति करने वाले दो शिष्य हुए। उनमें स्वामी, जंबूस्वामी, प्रभवस्वामी, शय्यंभव स्वामी की प्रथम श्रीजिनेश्वरसूरि सूर्य जैसे हुए । जिसके उदय पाने परम्परारूप अपूर्व वंशवृक्ष की, वज्रस्वामी की शाखा में पर अन्य तेजस्वि-मंडल की प्रभाका अपहरण हुआ हुए श्रीवर्धमानसूरिजी का वर्णन १००३४, ३५ गाथा में था। जिसके हर-हास और हंस जैसे उज्ज्वल गुणों के किया है। उनके दो शिष्य (१) जिनेश्वरसूरि और (२) समूह को स्मरण करते हुए भव्यजन आज भी अंगों पर बुद्धिसागरसूरि का परिचय १००३६ से १००३६ गाथाओं रोमांच को धारण करते हैं । में कराया है और दूसरे, निपुण श्रेष्ठ व्याकरण प्रमुख बहु शास्त्रकी "तस्साहाए निम्मलजसधवलो सिद्धिकामलोयाणं ।। रचना करने वाले बुद्धिसागरसूरि नाम से जगत् में सविसेसवंदणिज्जो य, रायणा थो(थे) रप्पवग्गोव्व ॥ प्रख्यात हुए। १००३४ ॥ उनके (दोनों के) पद-पंकज और उत्संग-संग से कालेणं संभूओ, भयवं सिरिवद्धमाण मुणिवसभो। परम माहात्म्य पानेवाला प्रथम शिष्य जिनचन्द्रसरि निप्पडिम पसमलच्छो-विच्छड्डाखंड-भंडारो ॥ १००३५॥ नामवाला उत्पन्न हुआ । और दूसरा शिष्य अभयदेवसरि ववहार-निच्छयनय व, दब-भावत्थय व्व धम्मस्स । पूर्णिमा के चन्द्र जैसा, भव्यजनरूप कुमुदवन को विकस्वर परमुन्नइजणगा तस्स, दोणि सीसा समुप्पण्णा ॥ करनेवाला हुआ। [-- इसके पीछे का १००४१ से ॥१००३६।। १००४४ तक गाथा का सम्बन्ध उपर आ गया है ] पढमो सिरिसूरिजिणेसरो त्ति, सूरो ब्व जम्मि उद्यम्मि । १००४५ गाथा में ग्रन्थकार ने सूचित किया है किहोत्था पहाऽवहारो, दूरंत-तेयस्सि चक्कस्स ॥ १०० ३७ ॥ श्रमण मधुकरों के हृदय हरनेवाली इस आराधनामाला अज्ज वि य जस्स हरहास-हंसगोरं गुणाण पत्भारं । (संवेगरंगशाला) को भव्य जन अपने सुख (शुभ) निमित सुमरंता भव्वा उवहंति रोमंचमंगेसु ॥ १००३८ ।। विलासी जनोंकी तरह सर्व आदर से अत्यन्त सेवन करें। बीओ पूण विरइय-निउण-पवर वागरण-पमह-बहसत्यो। १००४६ से १००५४ गाथाओं में कृतज्ञताका और रचना नामेण बुद्धिसागर सूरित्ति अहेसि जयपयडो ॥१००३६॥ स्थलका सूचन किया है कि - "सुगुण मुनिजनों के पदतेसि पय-पंक उच्छंग-संग-संपत्त-परम-माहप्पो। प्रणाम से जिसका भाल पवित्र हुआ है, ऐसे सुप्रसिद्ध श्रेष्ठी सिस्सो पढमोजिणचंदसूरि नामो समुप्पन्नो ॥१.० ४०॥ गोवर्धन के सुत विख्यात जजनाग के पुत्र जो सुप्रशस्त अन्नो य पुन्निमाससहरो ब्व, निव्वविय-भव्व-कुमुयवणो ।' तीर्थयात्रा करने से प्रख्यात हुए, असाधारण गुणों से जिन्होंने [ गाथा १००४१ से १००४४ तक पहिले दर्शाया है ] उज्ज्वल विशाल कीर्ति उपार्जित की है । किबिबोंकी भावार्थ:-उन (वज्रस्वामी) की शाखा में काल-क्रम प्रतिष्ठा कराना, श्रुतलेखन वगैरह धर्मकृत्यों द्वारा से निर्मल उज्ज्वल यशवाले, सिद्धि चाहने वाले लोगों के आत्मोन्नति करनेवाले, अन्य जनों के चित्त को चमत्कार लिए राजा द्वारा स्थविर आत्मवर्ग की तरह (?) विशेष करनेवाले, जिनमत-भावित बुद्धिवाले सिद्ध और वीर वंदनीय, अप्रतिम प्रशमलक्ष्मीवैभव के अखंड भण्डार, नामवाले श्रेष्ठियों के परम साहाय्य और आदर से यह Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210531
Book TitleJinchandrasuri ki Shreshth Rachna Samverangshala Aradhana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalchandra B Gandhi
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size2 MB
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