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________________ हुए अहमदाबाद पधारे। १९६१ का चातुर्मास किया। केशरीचन्द ने उद्यापन किया। धम्माभाई, पानाभाई, फिर तारंगाजो, खंभात यात्रा कर सं० १९७० का मोतीभाई आदि ने चतुर्थ व्रत ग्रहण किया। सं० १९७५-७६ चौमासा पालीताना किया। रतलाम वाले सेठ चाँदमलजी का चातुर्मास करके सं० १९७७ में बड़ौदा चातुर्मास किया। को धर्मपत्नी फूलकुंवर बाई ने आपसे भगवतीसूत्र बंचाया, रतलाम वाले सेठजो ने आकर मालवा पधारने की वीनती की उपधान करवाया । सोने को मोहरों की प्रभावना और और रुपया-नालेर की प्रभावना की । तदनन्तर आप अहमस्वधर्मीवात्सल्यादि किये।। दाबाद, कपड़बंज, रम्भापुर, झाबुआ होते हुए रतलाम पालीताना से आपश्री भावनगर, तलाजा होते हुए पधारे। उपधानतप के अवसर पर रतलाम-नरेश सजनखंभात पधारे। वहाँ से सेठ पानाचन्द भगूभाई की विनती सिंहजी भी दर्शनार्थ पधारे। यहाँ पाँच साधु-साध्वियों से सूरत पधार कर सं० १९७१ का चौमासा किया। वहाँ को दीक्षित कर इन्दौर पधारे । सं० १९७६ का चातुर्मास साधुओं को दीक्षा दी। तदनन्तर जगड़िया, भरौंच, कावी कर भगवती मूत्र वांचा। रतलाम वाले सेठाणीजी ने तीर्थ होते हुए पादरा पाधारे । वहाँ से बड़ौदा होते हुए रुपया नारेल की प्रभावना को। श्रीजिनकृपाचन्द्रसूरिजी बम्बई पधारे । मोतोसाह सेठ के वंशज सेठ रतनचन्द खीम- ज्ञान भण्डार की स्थापना हुई। उ० सुमतिसागरजी को चन्द, मूलचन्द हीराचन्द, प्रेमचन्द कल्याणचन्द, के शरीचन्द महोपाध्याय पद, राजसागरजी को वाचक पद व मणिकल्याणचन्द आदि संघ ने आपका प्रवेशोत्सव बड़े ठाठ से सागरजी को पण्डित पद से विभूषित किया गषा। कराया। लालबाग में सं० १९८२ का चौमासा करके संघ सहित मांडवगढ़ की यात्रा कर भोपावर, राजगढ़, भगवतीसूत्र वाँचा। आपको विद्वत्ता, वाचनकला और खाचरोद, सेमलिया होते हुए सैलाना पधारे । सैलाना नरेश उच्चचरित्र से संघ बड़ा प्रभावित हुआ और आपकी इच्छा न आपके उपदेशों से बड़े प्रभावित हुए। तदनन्तर प्रतापगढ़ होते होते हुए भी संघ के अत्यन्त आग्रह से आचार्यपद स्वीकार हए मंदसौर में सं० १९७६ का चातुर्मास किया। वहाँ से करना पड़ा। इस अवसर पर लालबाग में पंचतीर्थी को नीमच, नींबाहेड़ा, चित्तौड़ होते हुए करहेड़ा पार्श्वनाथ और रचना हुई । बीकानेर से श्रीजिनचारित्रसूरिजी को साम्नाय देवलवाड़ा होकर उदयपुर पधारे। कलकत्ता बाले बाबू सूरिमंत्र देने के लिए बुलाया गया। चंपालाल प्यारेलाल के संघ सहित केशरिया जी पधारे । सं० १६७३ का चौमासा भी बम्बई हुआ। विहार वहाँ से लौटकर सं० १९८१ का चातुर्मास ठाणा २५ से करके मार्ग में तीन साधुओं को दोक्षित किया । सूरतवालो उदयपर किया। तदनन्तर राणकपुर पंचतीर्थी करके जालौर, कमलाबाई को विनती से बुहारी पधार कर चातुर्मास बालोतरा पधारे। सं० १९८२ का चातुर्मास बातोतरा किया और श्रीवासुपूज्य भगवान के जिनालय की प्रतिष्ठा किया । नाकोड़ा पार्श्वनाथ यात्राकरके संघसहित जेसलमेर करवायी। तीन दीक्षाएं दीं। सुरत चातुर्मास के लिए पधारे । साध-विहार न होने से मारवाड़ में लोग धर्म पानाचन्द भगुभाइ आर कल्याणचन्द घलाभाइ आदि का विमख हो गये थे। ओपने जिनप्रतिमा के आस्थावान करके विशेष विनति से शोतलवाड़ो उपाश्रय में विराजे । पाना• बाहड़मेर में एक दिन में ४०० मुहपत्तियां तोड़वाकर श्रद्धालु चन्द भाई ने जिनदत्तसूरि ज्ञानभंडार बनवाया व उद्यान बनाया। सं० १९८३ में जेसलमेर चातुर्मासकर वहां के किया। इस अवसर पर श्रीजयसागरजी को उपाध्यायपद श्रीजिनभद्रसरि ज्ञानभंडार के ताडपत्रीय ग्रन्थों का जीर्णोव सुखसागरजी को प्रवर्तक पद से विभूषित किया। प्रेमचंद द्धार कराया । कई प्रतियों के फोटो स्टेट व नकले करवाई। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210530
Book TitleJinakrupachandrasuriji aur Unka Sadhu Samudaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhanvarlal Nahta
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size514 KB
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