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________________ मोह है: एसो सो पाणवहो पावो, चण्डो, रुद्दो .... मोह महब्भयत्तवहओ । और अहिंसा, समस्त जीवों के प्रति संयमपूर्ण आचरण-व्यवहार है- अहिंसा निऊणा दिट्ठा, सव्व भूएसु संजमो ।' वे सदा यही सिखाते रहे कि मनुष्य का चरित्रात्मक आन्तरिक रूपान्तरण मुख्य है, और इसके साधन है अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और समता । यही मानवतावाद या समष्टिवाद की आधारशिला है । एक जैनाचार्य का कथन है अहिंसा ही प्रमुख धर्म है, अन्य तो उसकी सुरक्षा के लिए है - 'अवसेसा तस्स रखणट्ठा ।' आध्यात्मिक चेतना की ऊर्ध्व गति से ही सम्भव है-- सनातन मूल्यबोध । वीर प्रभु ने इसी से शान्ति मार्ग पर चलने को कहा - बुद्ध परिनिव्वुडे च गाम गए नगरे व संजए । सन्ति मग्गं च बूहुए Jain Exion International समयं गोयम ! मा पमायए । - उत्तराध्ययन सूत्र १० / ३६ अहिंसा की साधना ही शान्ति का मार्ग है । वे कहते हैं 'बुद्ध, तत्वज्ञ और उपशान्त होकर पूर्ण संयतभाव से गौतम ! गाँव एवं नगर विचरण कर । शान्तिपथ पर चल । अहिंसा का प्रचार कर । क्षण भर भी प्रमाद न कर।' उन्होंने बताया कि धर्महीन नीति समाज के लिए अभिशाप है और नीतिहीन धर्माचरण केवल वैयक्तिक । धर्म व्यवहार से उत्पन्न है, ज्ञानी पुरुषों ने जिसका सदा आचरण किया वे व्यवहार और आचरण ही अपेक्षित हैं । इस प्रकार महावीर ने अहिंसा को वृहत् और व्यापक सामाजिक धरातल दिया । उनका विधान था 'चारितं धम्मो ' सदाचार ही चारित्र धर्म है । व्यक्ति की हो, चाहे समाज या शासनतन्त्र की, हिंसा का कारण भय और क्रोध है । जैनधर्म कषाय को कालुष्य का कारण मानता है- आवेश, लालसा, ३४८ अधिकारलिप्सा और वित्तेषणा ही हिंसा और परिग्रह के हेतु है, 'गंथेहि तह कसाओ, वड्ढइ विज्झाई तेहि विणा ।' आधुनिक समाजशास्त्र व मनोविज्ञान में भी क्रोध, मान, माया और लोभ का वैज्ञानिक पद्धति से निरूपण मिलता है । क्रोध को ही लें। क्रोध प्रतिशोध माँगता है, वह मानसिक और शारीरिक संतुलन नष्ट कर देता है । भगवती सूत्र में इसकी विभिन्न अवस्थाओं का विवरण प्राप्त होता है। भगवान महावीर कहते हैं क्रोध - उचित अनुचित का विवेक नष्ट करने वाला है, वह प्रज्वलन रूप आत्मा का दुष्परिणाम है। आज मनोविज्ञान ने भी इस तथ्य को भलीभाँति उजागर कर दिया है। चरक ने तो यही बताया कि क्रोध आदि विकार से व्यक्ति ही नहीं, उसके आसपास का वातावरण भी विकृत हो जाता है । व्यक्ति और समाज में सार्वदेशिक शान्ति तभी सम्भव है जब हम अपनी जीवन प्रक्रिया में आमूल परिवर्तन करें। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक इरिक बर्न का कथन है 'मनुष्य की रचनात्मक जिजीविषा और संहारात्मक विजीगिषा वह कच्चा माल है, जिसका आज मनुष्य और संस्कृति को उपयोग करना है - समाज और मानवजाति की संरक्षा के लिए उसे संहारात्मक विजीगिषा समाप्त कर रचनात्मक जिजीविषा को आध्यात्मिक व जागतिक समृद्धि में लगाना होगा ।' व्यक्ति का मानसिक विकास और सामाजिक शान्ति इस पर निर्भर करती है कि वह इन जन्मजात शक्तियों का किस उद्देश्य से प्रयोग करे । व्यक्ति का मानसिक संतुलन ही सामाजिक संतुलन का प्रथम चरण है । महावीर ने अपनी सारी शक्ति इसी में लगाई। उन्होंने अहिंसा के सिद्धान्त को मनुष्य या पशु हिंसा तक ही सीमित न रखकर समस्त सचराचर जगत पर, षटकाय जीवों पर, जीवन के प्रत्येक पहलू और पक्ष पर अनिवार्य चतुर्थ खण्ड : जैन संस्कृति के विविध आयाम साध्वीरत्न कुसुमवती अभिनन्दन ग्रन्थ 212 www.jainelik.org
SR No.210481
Book TitleAhimsa aur Samajik Parivartan Adhunik Sandarbh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKalyanmal Lodha
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ahimsa
File Size2 MB
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