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________________ पं० हीरालाल जैन : गुणस्थान : ४३१ से औपशमिक सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है. जीव को सर्वप्रथम इसी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है, किन्तु इसका काल अन्तर्मुहूर्त ही है, अतः उसके पश्चात् वह सम्यक्त्व से गिर जाता है फिर और मिथ्यादृष्टि बन जाता है. पुनः यह जीव ऊपर चढ़ने का प्रयत्न करता है और बतलाई हुई सातों प्रकृतियों का क्षयोपशम करके क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि बनता है. इस सम्यग्दर्शन का काल अन्तर्महुर्त से लगाकर ६६ सागर तक है. अर्थात् किसी जीव को यदि क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन लगातार बना रहे-तो उसके देव और मनुष्यभव में प्ररिभ्रमण करते हुए लगातार ६६ सागर तक बना रह सकता है. जब जिस जीव का संसार बिल्कुल ही कम रह जाता है, तब वह क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि जीव, उक्त सातों ही प्रकृतियों का क्षय करके क्षायिक सम्यग्दृष्टि बनता है. यह जीव संसार में अधिक से अधिक तीन भव तक रहता है. उसके पश्चात् चौधे भव में नियम से ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है. इस गुणस्थानवी जीव की बाहिरी क्रियाओं में और मिथ्यादृष्टि की बाहिरी क्रियाओं में कोई खास अन्तर दिखाई नहीं देता, पर अन्तरंग की परिणति में आकाश-पाताल जैसा अन्तर हो जाता है. जहाँ मिथ्यादृष्टि की परिणति सदा मलीन और आर्तरौद्रध्यान-प्रचुर होती है, वहाँ सम्यग्दृष्टि की परिणति एकदम प्रशस्थ, विशुद्ध और धर्मध्यानमय हो जाती है. चारित्रमोहनीय कर्म के तीव्र उदय होने से यद्यपि चौथे गुणस्थान वाला जीव व्रत-शील-संयमादि का रंच मात्र भी पालन नहीं करता है, इन्द्रियों के विषयों की प्रवृत्ति भी बराबर बनी रहती है तथापि मिथ्यादृष्टि दशा में जो इन्द्रियों के विषय-सेवन में उसकी तीव्र आसक्ति थी,वह एकदम घट जाती है. वह अनासक्त रहता हुआ ही इन्द्रियों के विषयों का सेवन करता है, अन्यायपूर्वक आजीविका का परित्याग कर देता है और न्याय-नीति से ही धनादिक का उपार्जन करके अपना और अपने कुटुम्ब का भरणपोषण करता है. जैसे जल में रहते हुए भी कमल जल से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार यह असंयत सम्यग्दृष्टि जीव घर में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है और इन्द्रियभोगों को भोगते हुए भी उनमें अनासक्त रहता है. (५) देशसंयत गुणस्थान : चौथे गुणस्थान में रहते हुए जीव आत्मविकास की ओर अग्रसर होता है, तब उसे ऐसा विचार उत्पन्न होता है कि मैं जिन भोगों को भोग रहा हूँ ये भी कर्मबन्धन के कारण हैं, विनश्वर हैं और अन्त में दुःखों को ही देने वाले हैं, तब वह हिंसा, झूठ, चोरी, अब्रह्मचर्य और परिग्रह इन पाँचों पापों का स्थूल त्याग करता है अर्थात् अब मैं किसी भी त्रसप्राणी का संकल्पपूर्वक घात नहीं करूंगा, ऐसी प्रतिज्ञा करके अहिंसाणुव्रत को अंगीकार करता है. आज से मैं राज्य-विरुद्ध, समाज-विरुद्ध, देश-विरुद्ध और धर्म-विरुद्ध असत्य नहीं बोलूंगा, इस प्रकार से स्थूल झूठ का परित्याग करके सत्यारणुव्रत को स्वीकार करता है. अब मैं बिना दिये किसी की वस्तु को नहीं लूंगा. मैं दायाद (भागीदार) का हक नहीं छीनूगा, राज्य के टैक्सों की चोरी नहीं करूंगा, इस प्रकार से स्थूल चोरी का त्याग करके अचौर्याणव्रत का पालन करता है. अपनी विवाहिता स्त्री के अतिरिक्त संसार की स्त्रीमात्र को अपनी मां, बहिन और बेटी के समान समझ कर उन पर बुरे भाव से दृष्टिपात नहीं करूंगा, इस प्रकार स्थूल कुशील का त्याग करके ब्रह्मचर्याणुव्रत को अंगीकार करता है. और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखता हुआ अनावश्यक परिग्रह के संग्रह का परित्याग कर परिग्रहपरिमाणारणुव्रत को स्वीकार करता है. तथा इन ही पाँचों अणुव्रतों की रक्षा और वृद्धि के लिये तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत रूप सात शीलव्रतों को भी धारण करता है. इस प्रकार वह सम्यग्दर्शन के साथ श्रावक के उक्त १२ व्रतों का पालन करते हुए आदर्श गृहस्थजीवन बिताता है. मिथ्यादृष्टि जीव की अपेक्षा असंयतसम्यग्दृष्टि जीव के परिणामों की विशुद्धि अनन्तगुणी अधिक होती है और अविरत सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा इस देशसंयत जीव के परिणामों की विशुद्धि और भी अनन्तगुणी होती है. इस गुणस्थान वाला संसार से उत्तरोत्तर विरक्त होते हुए अपने आरम्भ और परिग्रह को भी घटाता जाता है और श्रावक के प्रतिमारूप में जो ग्यारह दर्जे शास्त्रों में बतलाये गये हैं, उनको अंगीकार करता हुआ अपने आत्मिक गुणों का विकास करता रहता है. अन्त में सर्व आरम्भ का त्यागकर, शुद्ध ब्रह्मचर्य को धारण कर अपनी स्त्री का भी परित्याग कर, तथा घर-बार को भी छोड़ कर या तो साधु बनने की ओर अग्रसर होता है या जीवन को अल्प समझकर सल्लेखना को धारण कर समाधिमरणपूर्वक अपने शरीर का परित्याग करता है. SOD .0.0.. को RSIOSका ___Jaintameterminoine min elibrary.org
SR No.210451
Book TitleGunsthan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherZ_Hajarimalmuni_Smruti_Granth_012040.pdf
Publication Year1965
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Spiritual
File Size855 KB
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