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________________ 1 25 धादि का प्रयोग न कर उदयागत कर्मो को भोगकर नाश प्रकार "सरल-समाधि" की दोनों कापियाँ जिसमें अपनी करना ही उनका ध्येय था। ऐसे समय में उनकी ध्यान प्रसिद्धि की संभावना समझ कर तीब्र वैराग्यवश अप्राप्य समाधि और भी उच्चस्तर पर पहुँच जाती। सत्य है कर दिया। गुरुवर्य श्री जिनरत्नसूरि जो व विद्यागुरु उपाजिसे देहाध्यास नहीं, आत्मा के शास्वत अविनाशोपन का ध्याय जो श्री लब्धिमुनिजी की स्तवना में संस्कृत व अखण्ड ज्ञान है उसे शरीर की चिन्ता हो भी केसे सकती भाषा में कई पद्य रचे। आपको सभो रचनाएं प्रकाशित है ? तो इस प्रकार की आत्मरमणता और शरीर के प्रति करने की भावना होते हुए भी हम आपको आज्ञा न होने निर्मोहीपन से आप के शरीर को अर्शव्याधि ने जोर मारा से प्रकाशित न कर सके। आपके प्रवचनों का यदि सांगो और अशक्ति बढ़ती गई। गत पर्युषण पर देह व्याधि का पांग संग्रह किया जाता तो वह मुमुक्षुओं के लिए बड़ा ख्याल न कर श्रोताओं को अपने प्रवचनों का खूब लाभ हो उपकारी कार्य होता। दिया। 28 कोलो से भी क्रमशः शरोर क्षीण होता गया वर्तमान यग में श्रीमद राजचंद्र सर्वोच्च कोटि के घटता गया पर सतत आत्मचिन्तन में रहे उन महायोगी धमिष्ठ, साधक और आत्मज्ञानी हए हैं। दादा साहब की ने गत कार्तिक शुक्ल 2 की रात्रि में इस नश्वर देह का उदार प्रेरणावश आपने उनके ग्रन्थों को आत्मसात् कर त्याग कर दिया। अधिकाधिक विवेचन अपने प्रवचनों में किया। उनके दादा साहब श्री जिनदत्तसूरिजी आदि गरुजनों के प्रति / प्रति आपकी अटूट श्रद्धा-भक्ति थी जिससे आपने श्रीमद् आपकी अनन्य भक्ति थी और आपका जीवन भी उन्हीं के अनुभव पथ को खूब प्रशस्त किया। श्रीमद् राजचंद्र के पथ-प्रदर्शन में उदयाधीन प्रवृत्त था। दादा साहब ग्रंथ में से "तत्त्व-विज्ञान" नाम से उनको चुनी हुई रचने ही आपको 'तू तेरा संभाल" ध्येय मत्र देकर आत्म नाओं का संग्रह प्रकाशित करवाया। श्रीमद् देवचंद्रजी साक्षात्कार की प्रेरणा दी थी। वर्तमान जैन समाज / की रचनामों का पुनः संपादन प्रकाशन करने के लिए अपने आत्म दर्शन मार्ग से हजारों योजन दर चला गया हमें हस्तलिखित प्रतियों के आधार से "श्रीमद देवचंद्र" है और शास्त्र-निर्दिष्ट आत्मसिद्धि से वछित आत्म-रमणता नथ तैयार करने की प्रेरणा दी। इसी प्रकार श्रीमद् से दूर केवल बाह्य चकाचौंध में भटका हुआ है। इस आनंदघन जी को कृतियों ( बावोसो स्तवन और पद वर्तमान प्रवृत्ति से आपकी भाव दया प्रेरित उपकार बुद्धि / बहुत्तरी) के पाठों को भी प्राचीन प्रतियों के आधार से आत्मदर्शन की प्रेरणा देती रही। आपके हृदय में गच्छों सुसंपादित संस्करण प्रकाशन करने का सुझाव दिया / की तो बात ही क्या पर दिगम्बर-श्वेताम्बर भेद-भावों ___ हमने आपके आदेशानुसार ये दोनों कार्य यथाशक्ति किये को भी मिटा देने को भावना थो वे स्वयं दिगम्बर अध्या- हैं और उन्हें शीघ्र ही प्रकाशन किया जायगा। हमारी त्मिक ग्रंथों को अध्ययन करते और उन्होंने उन ग्रंथों को भावना थी कि ये दोनों ग्रन्थ आपश्री के निरीक्षण में भाषा पद्यों में गफित कर अध्यात्मिक जगत का महान प्रकाशित हों पर भवितव्यता को ऐसा स्वीकार नहींथा / उपकार किया है / नियमसार, समाधिशतक आदि खरतर गच्छ में और भी कई त्यागो वैरागी अध्यात्म कृतियां उसी का परिणाम है। श्रीमद् आनंदघन जो की प्रिय साधु साध्वी हुए हैं उनमें से प्रवत्तिनी स्वर्णश्री जी चौबीसी का आपने 17-18 स्तवनों तक का मननीय विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में उ० विवेचन लिखा व पदों का भी अर्थ संकलन किया था। श्री क्षमा ल्याण जी ने संवेगी मुनियों की परम्परा प्रारम्भ आपने प्राकृत व भाषा में दादा साहब के स्तोत्र स्तवनादि को उनमें श्री सुखसागर जी का समुदाय आजक विद्यरचे चैत्यवन्दन चौबीसी, अनुभूति को आवाज, संख्याबद्ध मान है, बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यति संप्रदाय में स्तवन व पदों का निर्माण किया। पचीस तीस वर्ष पूर्व से श्रोमोहनलालजी महाराज और श्रीजिनकृपाचन्द्रसूरिजी आपने प्राकृत व्याकरण को भी रचना की थी जिसे गुफा- महाराज ने क्रियोद्धार करके पचासों साधु-साध्वियों को वास की एकाकी भावना ने अलभ्य कर दिया। इसी संयमाधन में प्रवृत्त किए उनकी परम्परा भी चल रही है। . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210434
Book TitleKhartargaccha ki Krantikari aur Adhyatmika Parampara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhanvarlal Nahta
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Sangh
File Size3 MB
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