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________________ यतीन्दसूरि सम रकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य - मालिनी - मन्त्रप्रतिष्ठा नामक तृतीय सर्ग में श्लोकों की संख्या ७९ (ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः) जिसके चारों चरणों में क्रमशः है। इस सर्ग में प्रथम ५० श्लोक अनुष्टुभ् में निबद्ध हैं। इसके २२ नगण, नगण, मगण तथा यगण, यगण हों तथा आठ और सात अक्षरों श्लोक (५१ से ७३) रथोद्धता में, दो (७४-७५) शालिनी में पर यति हो, उसको मालिनी छन्द कहते हैं। और श्लोकसंख्या ७६ वंशस्थ में, ७७ शिखरिणी में, ७८ मालिनी यथा'१ . में और अंतिम ७९ पुष्पिताग्रा में निबद्ध है। अलघुलहरिलिप्तव्योमभागे तडागे, तरलतुहिनपिण्डापाण्डुडिण्डीरदम्भात्। ऊपर प्रयुक्त छन्दों में से अनुष्टुप्, मालिनी और पुष्पिताग्रा तरुणतरणितापव्यापदापन्नमुच्चेरिह विहरति ताराचक्रवालंविशालं ।।८०॥ का परिचय दिया जा चका है। अन्य छन्दों रथोद्धता, शालिनी. शार्दूलविक्रीडित २ - वंशस्थ और शिखरिणी का लक्षण और कीर्तिकौमुदी से उनके सूर्याश्वैर्मसजास्तता: सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् १ अर्थात् जिसमें मगण, उदाहरण निम्नवत हैं-- सगण, जगण, सगण और दो तगण तथा अन्त में एक गुरु हो और भोलता.. बारह, सात वर्णों पर यति हो तो उस छन्द का नाम शार्दूलविक्रीडित रान्नरातिह रथोद्धता तगौ। होता है। जैसे १३ - अर्थात् रगण, नगण, रगण, एक लघु, एक गुरु हो तो एकत्र स्फुटदब्जराजिरजसा बभूकृतः सुभ्रवां, उसका नाम रथोद्धता है प्रभ्रश्यत्कुचकुम्भकुकुंमरसैरन्यत्र रक्तीकृतः। उदाहरण७ - अन्यत्र स्मितनीलनीरजलदलच्छायेन नीलीकृतः, यौवनेऽपि मदनान्न विक्रिया, नो धनेऽपि विनयव्यतिक्रमः। श्रेयः सिन्धुरवर्णकम्बलधुरां धत्ते सर:शेखरः।।81॥ दुर्जनेऽपि न मनागनार्जवं, केन वामिति नवाकृतिः कृता ॥६१/३॥ द्वितीय सर्ग 'नरेन्द्रवंशवर्णन' में ११५ श्लोक हैं। इसके . प्रारंभ में ८१ श्लोक अनुष्टप में, अठारह श्लोक (८२ से ९९) शालि उपजाति में, तीन (१०० से १०२) इन्द्रवज्रा में, बारह (१०३ शालिन्युक्ता म्तौ तगौ गोऽब्धिलोकैः।। ११४) वसन्ततिलका में और अंतिम ११५वाँ श्लोक मालिनी अर्थात् इस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः मगण, दो छन्द में हैं। तगण और दो गुरु होते हैं। चार तथा सात वर्णों पर यति होती है। इस सर्ग में प्रयुक्त छन्दों में से वसन्ततिलका छन्द को उदाहरण१९ छोडकर अन्य छन्दों का लक्षण प्रथम सर्ग के विवरण के क्रम दष्टिनष्टा भपतीनां तमोभिस्ते लोभान्धान् साम्प्रतं कुर्वतेऽ ग्रे। में दिया जा चुका है। इसका लक्षण एवं कीर्तिकौमुदी से इसका यैर्नीयन्ते वर्त्मना तेन यत्र, अश्यन्त्याशु व्याकुलास्ते पिऽ तेऽपि।।७५।।३ उदाहरण निम्नवत् है-- वंशस्थ२० . वसन्ततिलक जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।। ज्ञेयं वसन्ततिलकं तभजा जगौ गः। अर्थात् वंशस्थ के चारों चरणों में से प्रत्येक में जगण, जिसके चारों चरणों में क्रमशः तगण, भगण, जगण और । तगण, रजगण और रगण होते हैं। दो गुरुवर्ण हों उसको वसन्ततिलक नामक छन्द कहते हैं। जैसे५ . उदाहरण२१ मुण्डेव, खण्डितनिरंतरवृक्षखण्डा, न सर्वथा कश्चन् लोभवर्जितः निष्कुष्डलेव दलितोज्ज्वलवृत्तवप्रा। करोति सेवामनुवासरं विभोः। दूरदपास्तविषया विधवेव दैन्यमभ्येभ्रम्येति तथापि कार्यः स तथा मनीषिभिः गूर्जरधराधिपराजधानी।।१०४/२।। परत्र बाधा न यथाऽत्र वाच्यता।।७६/३ aroordarsxroordwoniromowomewooorandomooo6n6d6९९6dminirombolanoroboorGrilordwordbrowroordar Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210396
Book TitleKirti Kaumudi me Prayukta Chanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherZ_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Publication Year1999
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Kavya
File Size528 KB
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