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________________ यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ : जैन-धर्म वाले के अर्थ में। ऋषभ ही रुद्र हैं और परमात्मा भी। ब्राह्मणों के जडवदवधूतवेषभाषाचारितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां शिव ही श्रमणों के ऋषभ हैं। साम्परायविधिमनुशिक्षयन् स्वाकलेवरं जिहाज्ञातव्य है कि जैनागमों में ऋषभदेव को धर्म का आदि सुरात्मन्यात्मानमसंख्यवहितमनर्थान्तरभावेनान्वीक्षमाण प्रवर्तक कहा गया है, तो श्रीमद्भागवत में ऋषभदेव के अवतार बो ल ता उपरतानुत्तिरूप उपरतानुवृत्तिरूपरराम।" तत्रैव ५.६.६) को रहस्य या अभिप्राय के सन्दर्भ में बताया गया है कि उनके 'श्रीमद्भागवत् के उल्लेखानुसार भगवान् ऋषभदेव का आविर्भाव का उद्देश्य वातरशना श्रमण ऋषियों के धर्म का अवतार रजोगुण से लिप्त लोगों को मोक्षमार्ग की शिक्षा देने के विवेचन करना था। इस सन्दर्भ का मूल रूप इस प्रकार है - लिए ही हुआ था - 'अयमवतारो रजसोपप्लुतकैवल्योप "इति निशामयन्त्या मेरुदेव्याः पतिमभिधायान्तर्दधेभगवान। बर्हिषि तस्मिन्नेव विष्णदत्त - शिक्षणार्थः (५.६.१२)। भगवान् परमर्षिभिः प्रसादितोनाभेः प्रियचिकीर्षया तदवरोधायनेमेरुदेव्यां धर्मान्दयितुकामो इस प्रसंग से और फिर भागवत में वर्णित ऋषभदेव की वातरशनानां श्रमणानामृषीणामूर्ध्वमन्धिनांशुक्लया तनुवावततार"।(५.४.२०) अन्य विशेषताओं से तत्त्वार्थ सूत्र का यह मंगलश्लोक तुलनीय हैश्रीमद्भागवत् में ऋषभदेव को भगवान् माना गया है मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम्। और उनकी प्रार्थना में सादर यह श्लोक कहा गया है - ज्ञातारं विश्वत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ।। नित्यानुभूतनिजलाभनिवृत्ततृष्णः, ऋषभदेव ने अपने नाम की सार्थकता के बारे में स्वयं श्रेयस्यतद्रचनया चिरसुप्रबुद्धेः। कहा हैलोकस्य यः करुणया भयमात्मलोक इदं शरीरं मम दुर्विभाव्यं, माख्यान्नमो भगवते ऋषभाय तस्मै ।। (५.७.१९) सत्त्वं हि मे हृदयं यत्र धर्मः। अर्थात् निरंतर विषय-भोगों की अभिलाषा करने के कारण पृष्ठे कृतो मे यद धर्म आराद्, अपने वास्तविक श्रेय से चिरकाल तक बेसुध हुए लोगों को, अतो हि मामृषभं प्राहुराः ।। (५.५.१९) जिन्होंने करुणावश निर्भय आत्मलोक का उपदेश किया और जो अर्थात् मेरे इस अवतार-शरीर का रहस्य साधारण जनों स्वयं निरंतर अनुभव होने वाले आत्मस्वरूप की प्राप्ति के कारण। के लिए बुद्धिगम्य नहीं है। शुद्ध सत्त्व ही मेरा हृदय है और उसी सब प्रकार की तृष्णाओं से मुक्त थे, उन भगवान ऋषभदेव को में धर्म की स्थिति है। मैंने अधर्म को बहुत दूर पीछे धकेल दिया है, नमस्कार है। इसी बलशालिता के कारण सत्पुरुष मुझे ऋषभ पुरुष कहते हैं। इससे स्पष्ट है कि श्रमण और ब्राह्मण दोनों परम्पराओं में श्रीमद्भागवत् के अनुसार ऋषभदेव आत्मतत्त्व की जिज्ञासा विशुद्धचरित ऋषभदेव का समान आदर था। दोनों परम्पराओं (परामवस्तावदबोधजातो-५.५.५) तथा अध्यात्म-शास्त्र के ने उन्हें पूज्य माना है। ऋषभदेव जैनों के आदि तीर्थंकर हैं, तो अनुशीलन (अध्यात्मयोगेन विविक्तसेवया - ५.५.१२) को वैदिकों के लिए साक्षात् विष्णु के अवतार हैं। अहे' या अहेत् का सर्वाधिक मल्य देते थे किन्त परवर्तीकाल के आईतों ने एक अर्थ विष्णु भी है (दे.आप्टे का कोश)। शिवपुराण के अवतारवाद और ईश्वरतत्त्व का अवमूल्यन कर दिया। वे अवश्य अनुसार अट्ठाईस योगावतारों में ऋषभदेव की भी गणना हुई है। ही अर्हतों के उपासक थे, आत्मा को ही सर्वश्रेष्ठ मानने वाली श्रीमद्भागवत् के ही अनुसार ऋषभदेव ने पश्चिमी भारत अध्यात्मवादी परम्परा को स्वीकारते थे, पर अवतार या ईश्वर (बृह्मावर्त) में आर्हत धर्म का प्रचार किया था। वे महान् को मुल्य नहीं देते थे। इस प्रकार अवतार और ईश्वर को मूल्य योगेश्वर थे। एक बार इन्द्र ने ईष्ावश उनके राज्य पण न देने पर भी श्रमणों और ब्राह्मणों का आत्मतत्त्व मूलक केन्द्रीय (अजनाभखण्ड) में अवृष्टि की स्थिति उत्पन्न कर दी, किन्तु भाव एक ही था। उन्होंने योगबल से वृष्टि करा दी (५.४.४)। उन्होंने अपने शरीर का त्याग योगियों को देहत्याग की विधि सिखाने के लिए ही ऋषभ शब्द की तरह 'वातरशना' का भी उल्लेख ऋग्वेद किया था) अथैवमखिललोकपालललामोऽपि विलक्षणै म आया ह - doodwidnidiomadroombrandurbodhideobridriorbrid६५60misdoorboorbondabadirirdrobrotoniromowonbroade हा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210306
Book TitleRushabhnath Shraman aur Bramhan Sanskrutiye ke Samanvay Setu
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRanjan Suridev
PublisherZ_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Publication Year1999
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & Tirthankar
File Size541 KB
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