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________________ योगसार टीका । २०५ जन्म देते हैं फिर उनके पालनमें, उनके पढ़ानेमें, उनके विवाहोंमें, उनके रोगादि निवारण में लगे रहते हैं : मानकषायकी तीव्रताले मनुष्योंको अपनो नामवरी करनेकी तीन चाह होती है । इसलिये धनादिको संग्रह करके नाना प्रकारके व्यवहारसे अपना यश फैलाना चाहते हैं। मानवोंमें पांचो इंद्रियोंके भोगकी तृष्णा बहुत प्रबल होती है । उनकी तृप्तिके लिये नित्य नये नये भोग चाहते हैं । उनके लिये अनेक कपट करके भी धन संग्रह करते हैं। धनकी व परिहकी रक्षा में चिंतित रहते हैं। स्त्रीके सम्बन्धहोनेसे कुटुम्ब के सम्बन्ध बहुत बढ़ जाते हैं। सम्बन्धियोंके जीवन मरण व विवाहादि कार्य में लगे रहते हैं। इतने अधिक कार्योंकी चिंता मनुष्यों को रहती है कि एक दिनकेची वण्टे पूरे नहीं पढ़ते हैं । दिनरात मोहके जाल में फंसे हुए व्याकुल रहते हैं। कभी भी मनको शांत करके मैं कौन हूं इस बात पर गम्भीरता से नहीं विचार करते हैं । कोई परोपकारी गुरु आत्मा के हितकी बात सुनाना चाहते हैं तो उनकी तरफ ध्यान नहीं देता है। त्यागकी व वैराग्यकी बात कटु भासती है । अर्थ व काम पुरुषार्थमें व इन्हींके लिये पुण्यके लोभसे व्यवहार धर्मके करनेमें इतना तन्मय रहता है कि निश्चय धर्मकी तरफ विचारनेका एक मिनट के लिये अवकाश नहीं पाता है । इसतरह प्रायः सारा ही संसार बोखला होकर कमोंको बांध कर चारों गतियों में भ्रमण किया करता है । संसारसे पार होनेका उपाय जो आत्मदर्शन है उसका लाभ कभी नहीं कर पाता है। आत्मानुशासन में कहा है बाल्ये वेत्सि न किञ्चिदप्यपरिपूर्णाङ्गो हितं वाहितं कामान्धः खलु कामिनी दुमधने भ्राम्यन्वने यौवने ।
SR No.090549
Book TitleYogasara Tika
Original Sutra AuthorYogindudev
AuthorShitalprasad
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year
Total Pages374
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Yoga, & Spiritual
File Size6 MB
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