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स्थितिकाल ___वादेराज ने अपने ग्रन्थों की प्रशस्तियों में रचना काल का निर्देश किया है। ये प्रमेयकमलमार्तण्ड और न्यायकुमुदचन्द्रोदय के रचयिता प्रभाचन्द्र के समकालीन तथा अकलंकदेव के ग्रन्थों के व्याख्याता हैं। प्रसिद्ध है कि चालुक्य नरेश की राज्यसभा में इनका बड़ा सम्मान था और प्रख्यात वादी होने से इन्हें 'जगदेकमल्नवादी' कहा जाता था। जयसिंह (प्रथम) दक्षिण के सोलंकी वंश के प्रसिद्ध महाराज थे। इनके राज्यकाल के तीस से अधिक दानपत्र और अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं जिनमें सबसे पहला अभिलेख शकसंवत् ६३८ (ई. सन् १०१६) का है और अन्तिम शकसंवत् ६६४ (ई. सन् १०४२) का है अतएव इनका राज्य काल १०१६-१०४२ ई. सन् हैं। यशोघरचरित के तृतीय सर्ग के अन्तिम पप और चतुर्थ सर्ग के उपान्त्य पद्य में जयसिंहदेव का उल्लेख किया है अतः इससे स्पष्ट है कि यशोधरचरित की रचना भी कवि ने जयसिंह के समय में की है। फलतः वादिराज सूरि की कालस्थिति १०१६ ई. सन् से १०४२ ई. सन् तक सिद्ध होती है।
जैनसंस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर के ग्रन्थमाला-सम्पादक श्रीमान् पं. कैलाशचन्द्र जी सिद्धान्ताचार्य के आदेश पर मैंने वादिराजग्रन्थावली के नाम से उनके पार्श्वनाथ चरित, यशोधरचरित, और एकीभाव स्तोत्र का सानुवाद संकलन कर ग्रन्थमाला में भेजा था। धवलाटीका के महत्त्वपूर्ण प्रकाशन का कार्य चालू रहने से उक्त ग्रन्थ प्रकाश में नहीं आ सके। अन्त में, बहुत प्रतीक्षा के बाद वापिस मंगाने पर यशोधरचरित और एकीभाव ही वापस आया । पार्श्वनाथ चरित की संस्कृत और अनुवाद की पाण्डुलिपि नहीं आयी। पत्राचार करने पर व्यवस्थापक जी ने उत्तर दिया कि मुझे मालूम नहीं, कहा गयीं। पार्श्वनाथ चरित की भाषा प्रौढ़ संस्कृत है अतः उस पर मैंने संस्कृत टिप्पण भी लिखे थे। अस्तु, मैं प्रकरण को बढ़ाना नहीं चाहता। कल्याणकल्पद्रुम (एकीभाव) और यशोथरचरित का प्रकाशन डॉ. चेतनप्रकाशजी पाटनी जोधपुर के सौजन्य से हो रहा है, इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। कल्याणकल्पद्रुम
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