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________________ ७६ यशस्तिलकचम्पूकाव्ये चेटस्य मांसेन विधिपूर्वक देवाः पितरो बाह्मणारच' इत्पलापालचारपममविषोन्मेषकलषरक्षुषमाशु स्वयमेव वपापो. पतपर्वताकारपापाणात स पलस्तमुपाग्यायं मनुष्यपद्धभावे-ननु भट्टस्य किमो महान प्रयासः' इति । भट्टः समयः सविस्मयश्च प्रत्याचपटे-'महापुरुष, तब स्वागमनाम' इति । छाप:--'अन्य खलु ते घराकतनधः पावो में मनमिषेण भवता भक्षिताः। अत्र तु प्रस्तरप्रतिमाफवलन इच केवलं पन्नमङ्गलव' इति थिचिन्त्य किनिद्विहस्य छ स हतमस्तं पुनरेवमवोचल 'माहं स्वर्गकोपभोगतृपितो नाभ्यायतस्त्वं मया सन्तुष्टस्तृणभक्षणन सततं हन्तुं न युक्तं तव । स्वर्ग यान्ति यदि त्वया विनिहता यज्ञ ध्रुषं प्राणिमो यजं कि न करोषि मातृपितृभिः पुत्रस्लया पाम्पवः ।।१७।।' ____ तक्ष्नु भो महाराज, सा महोयाम्बिका गमोक्तिषु निरुसरा सती परमुपायानरमपश्यन्ती 'सम्धप्रतिष्ठातन्त्रेषु हि राजनेशमार्यमन्तिमावि मारिष्टाः मराः। सरेत कुशलमतिभिः शान्तिकमणंष कर्तव्याः काययभ्यन्तराः' इति, तथा 'महत्यपि हि पुत्रे सवित्रीगो बाल माल इव चाटुकारलेला एकालापाः बलाध्यन्ते, न पुनः कर्णकलुकाः' इति स विचिन्त्य, 'मातः, 'आलमलमनेन भमाधेयस्करणोपचारेण' इति स्या सहबदमानं विनिवार्यमाणापि जब शिष्य वेसा ही कर रहा था अर्थात् जन वह बकरे को बांधकर ले जा रहा था तब वह बकरा पृथिवीपर बच से कीलित हा गरीखा बेठ गया और प्रस्तुन उपाध्याय के साढ़े पांच मी शिष्य मिलकर भी उसे उठा न सके । 'इस बकरे के मांग द्वाग बेदीक विधि से विवादि चेवता, पिता-आदि पूर्वज एवं बाह्मग-आदि तृप्ति प्राप्त करें इस प्रकार के भाषण री उत्कट योध करनेवाले व जिसके नेत्र क्रोधरूप विष की उत्पत्ति से लाल हुए हैं एवं जो शीघ्र स्वयं ही बघ करने के लिए उठाए हा पर्वताकार सरोखे पाषाणों से कर्कश हो रहा था ऐसे उपाध्याय से बह घबरा मनुष्य-सरीखा ( मनुष्य की वाणी से ) निम्न प्रकार बोला--'भट्ट का यह महान प्रयास किस कारण से ही रहा है ?' उपाध्याय भयभीत ब आश्चर्यान्वित होता हुआ निम्न प्रकार बोला'हे महापुरुष ! आपके स्वर्गगमन के लिए मेरा प्रयास है। उक्त बात को सुनकर बकरे ने मन में विचार किया । 'दूसरे पशु, जो कि यज्ञ के बहाने से आपके द्वारा भक्षण किये गए हैं, वे अविनिकर ( अल्प ) वारीरधारी थे, परन्तु विशाल शरीर-धारक मेरे त्रिपय में चट्टान की मूर्ति को चबाने समान केवल तुम्हारे दांत टूटेंगे।' फिर उस बकरे ने कुछ हंसकर उपाध्याय से कहा-'हे भट्ट! मैं { बकरा ) स्वर्ग के भोग नहीं चाहता। 'मुझे स्वर्ग पहुँचाओ' इसप्रकार मैंने तुमसे प्रार्थना नहीं की 1 में तो वेरी आदि के पत्तों को चबाने से हो निरन्तर सन्तुष्ट है। श्रेष्ठ वर्णवालं तुम्हें कगं चाप्डाल-सरीखे होकर मेरा वध करना उचित नहीं है । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञ में मारे हुए प्राणी निश्चय में स्वर्ग जाते हैं, तो तुम माता-पिताओं तथा अपने प्रमों व बन्धुवर्गों से यज्ञ क्यों नहीं करते? ||१७७|| _फिर हे मारिदत्त महाराज | जब यह मेरों माता ( चन्द्रमत्ति , जो कि मेरे उक्तप्रकार के वचनों में उत्तरहीन है व जिसने दूसरा उपाय नहीं देखा और जो 'है माता ! मेरे इन पैरों पर पड़ने रूम अकल्याणकारक दिनय से पर्याप्त है' इमप्रकार विशेष मान-सहित मेरे द्वारा निवारण भी की जा रही है, मेरे पैरों पर विशेष प्रकट की हुई करणापूर्वका व प्रबाट हुई विशेष विनय सहित गिरी और उसने मुझसे निम्नप्रकार प्रार्थना की । मेरी माता ने क्या विचार कर? मुझमे निम्नप्रकार प्रार्थना की? 'निस्सन्देह समस्त संसार में सम्मान-समूह प्राप्त करने वालं राजपुत्रों के तंत्र्य स्वभाव से कुटुम्बवर्ग के प्रति घतला के कारण निर्दय होते हैं, अत: निपुणबुद्धिपाली पुरुषों को इन राजपुत्रों के लिए सामनीति से ही कर्तव्यों में अपने अधीन करना चाहिए ।' और निश्चय से महान पुत्र के प्रति माताओं के शिशुकालसरीखे मिथ्यास्तुतिबाले व स्नेहपूर्ण मोठे वचन ही प्रशंसनीय होते
SR No.090546
Book TitleYashstilak Champoo Uttara Khand
Original Sutra AuthorSomdevsuri
AuthorSundarlal Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages565
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Story, P000, & P045
File Size17 MB
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