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________________ कल्याणकीति जी तत्पट्टे आचार्यजी श्री श्री विशालकीर्ति जी तत्पट्टे आचार्य जी श्री श्री १०८ भानुकीर्ति जी दत्शिष्य पं० भागचन्दजी, गोवर्धनदासजी, हेमराजजी, बेणीरामजी, लक्ष्मीचन्दजी, लालचन्दजी, उदयरामजी, मनसारामजी, आर्जिका विमलश्री, लक्ष्मीमति, हरवाई, बखती', राजा", राही एतेषां मध्ये पंडितजी श्री भागचन्दजी सदिष्य पं० जी श्री दीपचन्दजी तस्शिष्य पंडितोत्तम पंडितजी श्री श्री चिमनरामजी तत्पौत्र शिष्य महाचन्द्रेणे 'यशस्तिलक' नाम महाकाव्यं लिपिकृतं सीकरनगरे जैनमन्दिरे श्री शान्तिनाथ चैत्यालये शेखावतमहाराय राजा श्री भैरवसिंहजी राज्ये स्वात्मार्थे लिपिकृतं शुभं भूयात् । इसका सांकेतिक नाम 'च' है। ५. 'च' प्रति का परिचय-यह प्रवि बड़नगर के श्री दि. जैन मन्दिर गोट श्री० सेठ मलूकचन्द हीराचन्द जी वाले मन्दिर की है। प्रस्तुत मन्दिर के प्रबन्धकों के अनुग्रह से प्राप्त हुई थी। इसमें १२४५३ इञ्च की साईज के २८३ पत्र हैं। इसकी लिपि पौष कृ. द्वादशी रविवार वि० सं० १८० में श्री पं० बिरधीचन्द जी ने की थी। प्रति की स्थिति अच्छी है। यह शुद्ध व सटिप्पण है। इसके शुरु में मुद्रित प्रति की भाँति श्लोक हैं और अस्वीर में निन्नप्रकार लेख है वि० सं० २ वर्षे पौषमासे कृष्णपक्षे द्वादश्यां तिथी आदित्यवासरे श्रीमूलसंघे नंघानाये बलात्कारगणे सरस्वतीगच्छे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये आचार्य श्री श्री शुभचन्द्रदेवाः तत्संघाष्टके पंडितजी श्री श्री नौनिधिराम जी तशिध्य पं. श्री नवलराम जी तशिष्य पं. बिरधीचन्द्र जी तेभेद यशस्तिलकचम्पू नाम शास्त्रं लिखित स्ववाचनार्थ। श्री शुभं भवतु कल्याणमस्तु। इसका सांकेतिक नाम 'च' है। अन्धपरिचय श्रीमत्सोमदेवतरि का 'यशस्तिलकचम्पू' महाकाव्य संस्कृत साहित्यसागर का अमूल्य, अनोखा व बेजोड़ रत्न है। इसमें ज्ञान का विशाल खजाना वर्तमान है, अतः यह समूचे संस्कृत साहित्य में अपनी महत्वपूर्ण अनोखी विशेषता रखता है। इसका गद्य कादम्बरी' व 'तिलकमरी' की टकार का ही नहीं प्रत्युत उससे भी विशेष महत्वपूर्ण व क्लिष्टतर है। प्रस्तुत महाकाव्य महान् लिष्ट संस्कृत में अष्टसहस्त्री-प्रमाण (श्राठ हजार लोक परिमाण) गद्य-पद्य पद्धति से लिखा गया है। इसमें आठ आषास ( सर्ग) हैं, जो कि अपने नामानुरूप विषय-निरूपक है। जो विद्वान् 'नवसर्गगते माघे नवशब्दो न विद्यते' अर्थात्'नौ सर्गपर्यन्त 'माई काव्य पढ़ लेने पर संस्कृत का कोई नया शब्द बाकी नहीं रहता' यह कहते हैं, उन्होंने यशस्तिलक का गम्भीर अध्ययन नहीं किया, अन्यथा ऐसा न कहते, क्योंकि प्रस्तुत ग्रन्थ में हजारों शब्य ऐसे मौजूद है, जो कि वर्तमान कोशग्रन्थों व काव्यशास्त्रों में नहीं पाये जाते। अतः 'गते शब्दनिधापस्मिन्नवशब्दो न विद्यते' अर्थात् 'शब्दों के खजानेरूप इस यशस्तिलकचम्पू के पढ़ लेने पर संस्कृत का कोई भी नया शन्द बाकी नहीं रहता' यह उक्ति सही समझनी चाहिए। पञ्जिकाकार श्रीदेव' विद्वान ने कहा है कि इसमें यशोधर महाराज के चरित्र-चित्रण के मिष से राजनीति, गजविद्या, अश्वविद्या, शस्त्रविद्या, आयुर्वेद, वादविवाद, नीतिशास्त्र, ऐविहासिक व पौराणिक दृष्टान्तमालाएँ, अनोखी व वेजोड़ काव्यकसा, हस्तरेखाविज्ञान, ज्योतिष, वेद, पुराग, स्मृतिशाख, दर्शनशास्त्र, अलकार, छन्दशास्त्र, सुभाषित १. देखिए-इसका अप्रयुक्त क्लिन्तम शब्द-निघण्टु (परिशिष्ट २ पृ. ४९९-४४.)। १. देखिए पत्रिकाकार का श्लोक नं ४२।
SR No.090545
Book TitleYashstilak Champoo Purva Khand
Original Sutra AuthorSomdevsuri
AuthorSundarlal Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size15 MB
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