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________________ रस यशस्तिलकपम्पूकाव्ये और रेल सर्व विको नव से नाम सोप सावरः । देव देवनेः समस्त्वया विमाप्ययं भूनममित्रवर्तनः ॥ ८४ ॥ पोरगाोपि विनीतचितः कृतारो बन्धषु तर चित्रम् । को नाम प्रस्म कलप्रवृद्धौ नीलोत्पलोल्लासविधौ गुरुवा ॥८६॥ स्वल्प राति बापुरतमाणः किवितासम्बन स्टोक मुरालि परिपसन्धाच्या निलम्पे धृतः । समारोहणावधीः पुमा तस्याः कशाने रालोकनकोपरमपमनास्लमनमाहुन्ति व ॥ ८ ॥ मादापालकबालकामणिविसं पत्र को पस्पति स्थाने तस्य वधानि इस्तवल वाभ्यां विहीनः पुनः । . सुनसा परिमालिको करितादम्याचा पायो निरपेटः शिशुरेष जातरुदिता दाय मोदाय च ॥ ८ ॥ सद्गेई परमेव पर शिशवः सन्ति में प्रारणे तेषां जन्म स्थैव लोचनपथ यासा न येषां सताः । तेवामाविलेपनं च नृपते पोपदेई: समं येषां लिविसरात्मजरजरचता न वक्षःस्थले ॥ ८८ . रख लेता है।३।। प्रस्तुत यशोधर महाराज की बाल-क्रीड़ाएँ देखकर कोई मनुष्य यशोर्च महाराज से कहता है कि हे स्वामिन् ! आप जिस पुरुष की ओर च्याष्टि-पूर्वक देखते हैं, उसके प्रति आपका पुत्र भी आदरबान है, इसलिए यह आपका पुत्र केवल आपके सौन्दर्य-आदि-शारीरिक गुणों से ही समानता नहीं रखता किन्तु निश्चय से भापकी बुद्धि से भी सरशता प्रकट कर रहा है | जिसप्रकार चन्द्रमा अपनी सलामों को वृद्धिंगत करने में और कुबलयों (चन्द्र-विकासी कमलों ) को प्रफुल्लित करने में किसी गुरु-आदि की अपेक्षा नहीं करता उसीप्रकार हे स्वामिन् ! आपका स्वामानिक विनयशील पुत्र, शिशु होने पर भी कानुजनों के प्रति आदर का बर्ताव करने में किसी गुरू आदि की अपेक्षा नहीं करता इसमें आश्चर्य की कोई बाव नहीं है। ॥८५| बच्चा अपने घुटनों व हाथों का श्राश्रय ( सहारा) लेकर कुछ गमनशील होता हुमायोड़ा-सा चलता है और सब कुछ अँगुलियों के पकड़ने का पालम्बन ( सहारा लेता है तब कुब चलता है, परन्तु ज्यों ही दूसरे के हाथों की अंगुलियों का पकड़ना थोड़ा छोड़ देता है स्यों ही तत्काल अमीन पर गिर जाता है, पूर्थिवी पर गिरते हुए उसे अब धात्री (धाय) अपने नितम्ब (कमर का पीछे का भाग) पर धारण करती है तब उसे उसके कन्धे पर चढ़ने की बुद्धि उत्पन्न होजाती है, पश्चात वह उस दूध पिलानेवाली पाव के केश पकड़कर खीचता है, ऐसा करने से जप धाय इसकी तरफ कुछ करष्टि से देखती है, पब यह कोष से कलुषित-चित होता हुआ उसका मुख ताड़ित कर देता है-थप्पड़ मार देता है । यह कामाता या धाय के केरापाश पकड़कर खींचता है और उनके रस-चूर्य व चन्दन-निर्मित मस्तर विखक मिटाकर उसे अपनी हथेली पर रख लेता है एवं मणि-चूर्ण के तिलक-युक्त माता के मस्तक पर इसमाय स्वापित करता है, परन्तु जब यह उक्त दोनों क्रियाओं से शून्य होता है, अर्थात्-विक्षक व इस्तकान की क्रियाएँ छोर देता है तब अपनी माता या धाय की करधोनी को उनकी कमर से खीमकर या कोसकर उससे अपने दोनों पैर बेष्टित कर लेता है लेता है। ऐसा करने से अब यह चलने में | बसमर्थ होजाता है तो रोने लगता है। ऐसी अनोस्त्री क्रियाएँ करनेवाला यह पचा मावा या धाय के दुःकामुख्य कारण होता है। अर्थात्-रोनेके कारण दुःखजनक और अपनी अनोखी. व ललित लीलाओं के दिखाने से आनापायक होता है | हे राजन् ! जिस गृह के माँगन पर बच्चे नहीं खेलते, यह गृह नहीं, किन्तु जंगल ही है। जिन पुरुषों ने अपने नेत्रों द्वारा बच्चों को टिगोचर नहीं किया, बना जन्म निरर्थक ही है और जिनका वक्षःस्थल धूलि-धूसरित वालों की धूलि से लिम्पिन नहीं हुआ, उन धुलों द्वारा अपने शरीर पर किया गया कपूर, कस्तूप व चन्दनादि सुगन्धित वस्तुओं का लेप कीचड़ के मेस्सरीमा निरर्थक है १-२. पावि-अलाहार । ३..माझेपालंकार । ४-५, जाति-मकार । ६. कमक र अपमालंकार।
SR No.090545
Book TitleYashstilak Champoo Purva Khand
Original Sutra AuthorSomdevsuri
AuthorSundarlal Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size15 MB
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