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________________ यशस्तिलक पम्पूकाव्ये सदस्मान शौड्रोदरि बाह्यमाह्मविलेन बिकल्पजालेन । सक्कयामि तावदेसदाला पोहदादेव हृदयात्राल परि विहिसाब रोड मकानो कम्' [ इत्येवं चिन्तयतिस्म ]1. अवसरे स्वामिनः प्रसारसं मानसमा साया इसरविलासनामकेन वैतालिकेनेदं वृमध्यभागीयतेस्म - 'नाना रिपवो न वापि भवतः कविनिदेशा रश: श्रीदेश तव देव या प्रणयिनी तस्यै न कोपीचयति । भाई टिमश्रममरप्रोशरतधाराजला सुखाव के लिदो पहचरी तख भवान् ॥ २४८ ॥ याचसैमुनिभिः समागमानिसर्गहिलो जनः प्रशाम्यति । आहार्यहिंसामलयः शमोदय भजन्ति यद्देव कुतः ॥ १४९ ॥ सीकरी कम्, अनवतंसमपि लोचन रुचिकुबलिस ८२ ין कर्णम्, अतः जिसप्रकार बौद्धदर्शन का विकल्पजाल | ज्ञान स्वरूप ) इन्द्रियों द्वारा प्रहण किये जाने बाले बाह्य घटपटादिपदार्थों के ज्ञान से शून्य होता है [ क्योंकि बौद्धदर्शन की एक शाखा क्षणिक ज्ञानाद्वैतवादी है, अतः उसके दर्शन में ज्ञान, वाह्य घटपटादि पदार्थ को नहीं जानता ] उसीप्रकार इस अवसर पर प्रस्तुत क्षुल्लक जोड़े के विषय में किया हुआ मेरा संकल्प - वकल्प समूह भी बाह्य पदार्थ (लक जोड़े का परिचय ) के ज्ञान से शून्य होरहा है । अतः उक्तप्रकार के संकल्प-विकल्प-समूह से कोई लाभ नहीं है। इसलिए मैं अपनी हृदय रूपी क्यारी की समीपस्थ भूमि में श्रङ्कारेत हुए उत्कण्ठा रूप वृक्ष को इनके साथ किये जाने वाले संभाषण रूप मनोरथ से फलशाली बनाता हूँ' प्रसङ्ग - प्रस्तुत शुलक जोड़े को देखकर मारिदत्त राजा ने अपने मन में उक्त विचार किया- इसी अवसर पर मारिदत्त राजा का हृदय कमल प्रफुल्लित जानकर 'अवसर विलास' नाम के वैतालिक (स्तुति पाठक) ने निम्नप्रकार दो श्लोक पढ़े- 'हे राजाधिराज ! शत्रु आपके निकटतर नहीं हैं, कोई पुरुष आपकी आज्ञा का उल्कुल नहीं करना. आपको यह राज्य लक्ष्मी आपसे स्नेह प्रकट करनेवाली है और इससे कोई भी ईर्ष्या नहीं करता । इसलिए आप अपनी ऐसी खजयष्टि (तलवार) को जिसका धाराजल, सुष्टि द्वारा दृढ़ता पूर्वक प्रण किये जाने के परिश्रम-भार से ऊपर पहला है, और जो युद्ध कीड़ा में आपकी भुजा की सखी- सरीखी है, छोड़िए । [ क्योंकि अब उससे आपका कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ] २ ॥१४८|| 'हे राजम् । जय स्वभावत: हिंसक पुरुष, करुणा रस से सरस हृदयशाली साधु पुरुषों की सति से शान्त ( दयालु ) होजाते हैं तब दूसरों के संसर्ग यश हिंसा में बुद्धि रखने वाले ( निर्दयी मानव) उनके संसर्ग से दचालु होते हैं. इसमें आश्चर्य ही क्या है ? अपि तु कोई आश्चर्य नहीं है ॥ १४९ ॥ फिर भी ( उक्त दोनों श्लोकों के पढ़ने के बाद भी ) उक्त वैतालिक ( स्तुतिपाठक ) ने प्रस्तुत ऐसे जोड़े को बड़ी देर तक देखकर निम्नप्रकार एक श्लोक पढ़ाकैसा हूँ यह क्षुक जोड़ा ? अतिशय मनोज्ञ होने के फलस्वरूप जो ऐसा मालूम पड़ता थामानों-चूड़ामणि ( शिरोरल) रूप आभूषण से रहित होता हुआ भी जिसका मस्तक केशों की किरण - समृह रूपी चूड़ामणि आभूषण से विभूषित है। कपूर से रहित होकर के भी, जिसके दोनों श्रोश (कान), नेत्रों की कान्ति से मानों- कुवलयत (चन्द्र विकासी कमल-समूह से अलंकृत) ही थे । रूपकालंकार | २. रूपकाकार | ३. नेपालंकार |
SR No.090545
Book TitleYashstilak Champoo Purva Khand
Original Sutra AuthorSomdevsuri
AuthorSundarlal Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size15 MB
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