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________________ सर्व भ्रमद्भ मरमरितं । पुष्पित फलितं चेति बिना काल नराधिप! ॥१३५॥ श्रुत्वा युत्थितश्चक्री परोक्षविनयान्यितः । ददी. तस्मै महादाम संतुष्टो रसदाटकं ॥ १३६दापयित्वो महानंददुदुर्मि पत्तने निजे । जनान् हापपतिस्माशु स्वयंभू र्षितोतरे ॥ १३७ ॥ समातुकः सपर्यायश्चचाल नागसम | बंदितु जगतां नार्थ नागमारुह्य मागधः ।। १३८ । घटोटक संघाताः प्रचेल विविधत्यिकः । सूर्यसतिसमाकाराः सुरैभिलाद्रिभूरुहाः ।। १३६ ॥ नागा नेदुः समुत्तुगाः पर्वता जंगमा नु घा। यार्दाप्रभावसे असमयमें भो वनके समस्त वृक्ष फल फलोंसे लवदा गये हैं और जहां तहां घूमते हुए भ्रमर गण उनपर गुजार शब्द कर रहे हैं। १३०-१३५ । मालीके मुखसे ये आनन्द प्रदान करनेवाले बचन सुन नारायण स्वंयभ एकदम सिंहासनसे उठकर खड़े हो गये । परोक्ष विनय की। एवं शुभ समाचार सुनने के कारण संतुष्ट हो से रह सुवाका बहुतसा दान दिया ॥ १३६ ॥2 FI चित्तमें अत्यंत हर्षायमान राजा स्वयंभ ने शीघ्र ही समस्त नगरमें आनंद भेरी बजवा दी और * भगवान विमलनाथके समवसरणका आना समस्त पुर वासियोंको जना दिया । वह पुण्यवान स्वंरिलायंभ तीन लोकके नाथ भगवान विमलनाथकी वंदना करनेके लिये शीघ्र ही हाथीपर सवार हो गया। तथा भाई परिवार और पुरवासियोंके साथ शीघ्र ही वनकी ओर चल दिया ॥ १३७--१३८ ॥ रंग रिंगी कांतिसे शोभायमान हींस लगाते हुए अनेक घोड़े चलने लगे जो कि सूर्यके घोड़ोंके समान र 4 जान पड़ते थे और अपने खुरोंसे वृक्ष और पर्वतोंको ढाह देनेवाले थे । बड़े बड़े ऊंचे हाथी चलने लगे जो कि जंगम चलते फिरते पर्वत सरीखे जान पड़ते थे । तथा उनके गंडस्थलोंपर । सिंदूर लगा हुआ था और मद भी झरता था इसलिये वे हाथी ऐसे जान पड़ते थे मानो चमकती हुई विजलीसे शोभायमान ये मेघ ही हैं ॥ १३६–१४० ॥ उस समय हका, छका, हांको, हटायो इत्यादि शब्दोंसे समस्त माकाश मंडल व्याप्त था । अनेक प्रकारके वाजोंके शब्द हास्योंके शब्द 14 और आनंद पूर्वक वजाये गये तालोंके शब्द हो रहे थे इसलिये आपसमें एकको दूसरेका शब्द नहीं Page
SR No.090538
Book TitleVimalnath Puran
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages394
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size14 MB
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