SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 93
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सन्धि २ मणपज्जय-संजुत्तम देवदेउ थिर-चित्तः । तार-हार-पंडुर-घरि कूल-गाम-णामह पुरि ।।धुवक।। भिक्खहि परमेसरु पइसरइ। घरि घरि सुसमंजसु संचरइ ।। मणपज्जय-गयणे परियरिउ । कूलहु घर-पंगणि अवयरिउ ॥ रायहु पियंगु-वण्णुज्जलहु । पणवतहु मालय-करयलहु ! थिउ भुवण-णाहु दिण्णउ असणु । णव-कोडि-सुधु मुणि-दिव्वसणु ।। तं लेप्पिणु किर जा णीसरिउ । ता भूमि-भाउ रयणहिं भरिउ ॥ देवहि जयतूर, ताडियई। गयणयलहु फुल्लई पाडियई ।। मो चारु दाणु उन्घोसियर। अइ-सुरहिउ पाणिउ वरसियउ ॥ मंदाणिटु यूढट सीयलउ । णिउ णर-वंदिउ बहु-गुण-णिलउ ।। एत्तहि. दुकम्मई णिद्ववइ । भीसणि णिजणि वणि दिणु गमइ ।। जिणु जिण-कप्पेण जि चकमइ । जो पाण-हारि तासु वि खमइ ॥ घत्ता-सुणह-सीह-सीयालहँ, ओरसियह सदूलहूँ । वणि अच्छइ उन्भुन्भज रणिहि णं थिरु खंभउ ॥१॥
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy