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________________ बौरजिणिवचरिउ [१.२.१ दुवई–कय-विन्भम-विलास परमेसरि बाल-मराल-चारिणी । कंकण-हार-दोर कहिसुप्तय कुंडल-मउड धारिणी ।। चंदक्क कति संपण्ण-कित्ति । सिरि हरि सलच्छि दिहि पंक्रयच्छि । सइ किसि बुद्धि जयनगब्भ-सुद्धि । आसाढ-मासि ससियर-पयासि। पानांना लि हा सिनि मालिक दिस-णिम्मलम्मि छट्ठी- दिम्मि । संसार-सेउ थिल गम्भि देव । संपण्ण-हिति कय कणय-विट्टि। जवखेण ताम णव-मास जाम । मासम्मि पति चित्ता-णिउत्ति । सिय-तेरसीह जणिओ सईद । जिणु मुवण-णातु मम्माह-देहु । मुणि-भासिया पपणासियाइँ । सह दोसयाई जइयहुँ गया। णिवुइ जिणिदि अह-तिमिरयंदि। सिरिपासणाहि लच्छी सणाहि । 'तणु केति-कंतु तझ्यहुँ तियंतु। बद्धाउमाणु सिरिवद्रमाणु । जइवहु पहूड जय-तिलयभूष। ___घत्ता-पयणि हि-खीरेहि कलसहि जिय-छणयंदहि ॥ अहि सित्तु जिणिटु मंदर सिहरि सुरिंदहि ॥९॥ दुवई-पुजिउ पुज्जणिज्जु मणि-दामहि भूसिउ भुवण-भूसणो । संथुज चित्त-वित्त-वावारहिं कु-समय-रइय-दूसणो॥
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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