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________________ १५ २० २५ ३० १२ वीर जिगिरिज अकवाल- चोन्जु जो देउ रुद्दु । महिष सुरेहिं जो गुण-समृद्दु ॥ ण गिलिउ गद्देण जो समर-सूरु | जो धम्मानंदु ण सघर-दूरु ॥ जो रु अहिंदल दलिय-मल्लु । जो पर-र-णाहहु जणइ सल्छु || अणिवेसिय-पिय-मंडल- कुरंगु । जो भषणइंदु अविडियंगु ॥ जो कामधेणु पसु भाव चुक्कु । जो चिंतामणि चिंता- विमुक्कु ॥ अणवरय-चाइ चार घण्णु । असहोयर-रिउ सयमेव कण्णु ॥ दो-बहुवि जो रणि सहसबाहु | सुहि-दिण्ण जी जीमूयबाहु ॥ बालिहारि रायाहिरात | जो कपरुक्खु णव कट्टभाव ॥ बत्ता - पियकारिणि देवि तुंग- कुंभ- कुंमत्थणि । तहु रायहु इह णारीयण - चूडामणि ||६|| ૭ दुबई - यहुँ बिहिं मि जक्ख कमलक्ख खरखियासबो । चवीस जिगिंदु सुख होही पय-जय णविय वासवो ॥ [ १.६.१५ : 1 }
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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