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________________ to १५ 상 २० वीरजिणिचरिउ २ । वियसिय- सरस- कुसुम-रथ-धूसरि । पचिमल-मुष-कमल-छाइय-सरि ॥ सिर-अल-बद्द - पूरिय-कंदरि । किंणर कर वीणा-रव-सुंदरि ॥ केसरि-कररुह दारिय-मयगछि । गिरि-गुह- णिहि णिहित्त-मुत्ताइलि ॥ हिंडिर-कथूरिय-मयपरिमलि । कुरर-कीर - कलयं ठी-कलयलि || परिओसिय-विलसिय-वणयर-गणि । महुयर - पिय-मणहरि महुयर-वणि ।। सबरु सु-दूसिउ दु-परिणामें । होत आसि पुरुरउ णांमें || चंड-फंड-कोड-परिग्गहु । काल- सबरि-आलिंगिय-विग्गहु ॥ अइ-परिरक्खिय थावर-जंगमु | सायरसेणु णामु जइ- पुंगसु ॥ विधहुँ तेण तेत्थु आढत्त । जाव ण मरगणु कह व ण घित्तर || ताम तमाल-नील मणि-वण्ण हूँ । सिसु करि दंत खंड-कय-कण्णई ॥ पत्ता--तण विरइय- कील हूँ गय-मय-गील हैं तरु-पत्ताइ-णियत्थ हूँ | वेल्ली-डित पंकयन्त हूँ पल-फल- पिढर- विहृत्थई ||२|| ३ भणिउ पुलिदियाइँ मा घायहि । हा है मूढ ण किंपि विषेयहि || मिगु ण होइ बुहु देवु भडारउ | हु पणविजन होय पियारण || [ १.२.१
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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