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________________ १० १५ to ૨૫ ३० वीर जिणिवचरिउ कंण तजय लंब मणि रुपय खर- पुहुई पासिया | वारुणि खीर खार घय-महु- सम जल जाई वि भासिया || दूरहु दरिसाविय धूम - मलिणु । अभी कडे विष वोइ जपु ॥ उपालि मंडल गुंजा - णिणाउ | दिस - विदिसा गं भिण्णु वाउ || गुम्छे गुम्म बली राणेसु । पसु रुक्ख साहा-घणेसु ॥ सु-पसिद्धु वणासइ-काड एसु । उपज जह घोसह जईसु || पञ्चतेयर हुमेरा वि । दुम साहारण पतंय के वि ॥ साधारणाएँ साहारणा हूँ । आणापाणई आहारणा है | पत्तेयहुँ पत्तयइँ गयाएँ । छिंद-भिंदण- णिणं गया है दादि कुखि किमि खुद संख । बी- इंदिय माँ भासिय असंख || ती- इंडिय गोमि पिपीलियाई । चउरिदिय मच्छिय-महुयराई ॥ यत्ता - परिवाडिए किंपि णाण-भवणु १२४ एयहँ जुत्ति साचडइ | रसुगंधु णय फासहु उयरि । एकेक इंदि चडर ||२|| इ पती पंच कम-संठिय छह सत्तट्ठ प्राणया । तेसिं होंति एम पभणंति महा मुणि विमल पाणया ॥ । १२. २.९
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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