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संधि ९
सेणिय-धम्म- परिक्खा
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अवरु विजबगृहण अक्खागड | कहमि समुज्झिय-दो सुहागन ॥ च - विह- सुर- निकाय - मज्झत्थं । सुय-नाणीहि माण सामत्यें ॥ मिच्छा धम्म करेिंद्र मदे | अरंज कहा सुरिंदे ॥ धम्म-स्स करते संतें । फेडिय - पुच्छय जण सण-भंतें || भूलि राया सेणिय- सन्निङ | दिढ सम्मत्तु भणेपिणु वन्नि || तं निसुचि अ-सहसाउ । एपिणु नहि चोय-स-बिसाउ ॥ निप्रवि नराहिउ एंतु ससेण । मग सरोवर कडिय मीणउ || चामरवादिहाणु विखायउ | सुर-वरु जाल-इत्थु रिसि जायज || ता तहिं मगसरु संपत्त । जन आलोवि जालु त्रियंत ॥ गुरु-हारज मीणपंत | पण वेष्पिणु विणण उत्तर || मईं दानें होतेणाहम्सउ । जुज्जइ तुम्ह ई एल न कम्मर ||
घत्ता - जइ कज्जु भसेहिं तो तुम्ह है पासत्य पहु ॥ होएहिउँसंपामि मच्छ बहु || १ ||