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________________ २० १० २० १५ ५ १५ ८० चोरजिदिचरिउ हूई अंतरि तहि जिवणंतरे । अपणु पाण भए दु-संचरे ॥ चडि पलाऊ गरुयारण व्यमि पावणे व भार || बत्ता - मुदितु भडारउ भव-भय-हारराव सह संघेय नियच्छिय | भय-वेविर गत्ते पाव-विरते - तेण नवेपणु पुछिउ |४|| कहि कहि साहु किंपि संखेवें । सासु कहिउ जो देवें ॥ ता वसु तासु सुहयारउ । कहिल रिसीसे सब सारख ॥ जं इच्छसि तं नेच्छ अं पुण नेच्छसि तुमं पुरिस-सीह | तं इन्सु जइ इच्छसि संसार-महन्नवं तरिढुं ।। चियाइय पर भाव विसज्जहि । निव्विसाइयनिय पविजहि ॥ सुणेवि एवं निब्वेएँ लइयउ । संखेवेण जे सो पव्वइयउ ॥ आयala stars विसेसें । थिउ पाउग्ग-मरणे संतोसें ॥ ता सेणिउस से तत्थाय उ । भाइ निपनि साहु संजायत || चंग कियउपसंस करेष्पिणु ॥ अंचेवि पुजेवि पणवेपिशु ॥ एत्यंतर अंतरिए निहालिङ । बइर बसान तान खम्भालिन || प्राणत्यो सबलियन हवेषिणु । कङ्क्षिय लोण सिरि वइसेष्पिणु ॥ [ ६.४.१३
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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