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________________ योजिशिवचरित [५. ४. ३५ढोइय बणि कुल-गयण-ससंकहु । भिच्चे वसहसेण-गामंकहु ॥ चत्ता-एकहि वासरि जाव जोइवि सेट्टि तिसाइच ।। बंधिवि कोतल ताइ जल-भिंगाबाइल ।।४|| चिट्ठ-दुट्ठ-कट्ठाइ रउदइ । ता दिट्ठी सेट्ठिणिइ सुहृदइ ।। मुंडिउ सिरु पावई पम्मेल्लहि । आयस-णियलु घित्तु णीसल्लाहि ॥ कोदव-कूरु सजिन दिजइ । णियमेव जा एव दमिजइ ।। ता परमेट्ठि छिण्ण-संसारउ | आयउ भिक्खहि वीक भडारउ ।। पखिलाहिवि विहीद किउ भोयष्णु । दियणउ तं तहु सउवीरोयणु ।। पत्त-दाण-तरु तक्खणि फलिया। गयागहु कुसुम-णिया परिघुलियउ ।। गन्जिय दुंदुहि बहु-माणिक है। पडियई भा-भारंपरिकाई ।। रवण-विचित्त-दिपण-विविहंगय । देवेहि मि देविहि बंदिय पय ॥ नियस-घोस-कोलाहल सह । जय-जय-जय-संजाय-णिण ।। गमिय मिगावइए लहुयारी । बहिणि सपुत्तइ गुण गरुयारी॥ यभि-सुयाइ पाविदुइ जं कि । तो विष साहइ विलसिउ विप्पि३ ॥ सेडिणि सेदि बे वि कम-णमियई। अम्हई पाव ई पावें खवियाँ। परमेसरि तुह सरणु पट्टई। एवहिं परितायहि पाविहई ।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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