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________________ वोरजिणिवचरित [५. १. २६उद्दायाणहु पहावइ राणी । विशाली उपासना महिउरि काम-वाण-परिहहउ । अलहमाणु अवरु चि आम्हा ।। जेहि कारणि सकचइ णामें । आयाउ जुज्झहु दुष्परिणामें । पदउ आइ वि चेड़य-रायहु । को सका करवाल-णिहायहु ।। अइ-दूसह-णिन्वेषं लइयाउ । दमवर-मुगिहि पासि पवढ्याउ ।। अण्णहि दिणि चित्तयरें लिहियाई । रूवई बर-पटुंतर-णिहियई ।। काम-विलास-विसेसुम्पत्तिहि । जोइयाई राएं णिय-पुत्तिहि ।। पडिउ बिंदु चेलिणि-ऊरूयलि | विट्ठल कयली कंदल-कोमलि ॥ तायें तोडु कयउ विवरेरउ । चित्तयरें बोल्लिड सुइ-सारउ ।। एवं विणु पडिबिंबु ण सोहइ । धाइ जाम ऊरुत्थलु चाहइ । ता दिहाउ तहि लंछणु एयइ। अखिउ रायहु जाय-विवेयइ ।। घत्ता-ता संन्द गरिंदु गउ रायहरहु लीलइ ।। जिण-पडिबिंबहँ पासि पडु संणिहिउ धणालइ ॥१॥ दिउ पडु पई पुच्छिय किंकर । तेहिं पवुत्तः बरि-भयंकर ।। एयई लिहियई विणय-विणीयह। विचई चेडय-महिवा-धीयह् ।। चउहुँ विवाह हुयट विहुरंतउ ! तीहि मज्झि ढो जोवणवंतउ ।।
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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