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________________ ४. २. १६ ] हिन्दी अनुवाद ४९ अचल है और केवलज्ञानप्रधान है। उस समय मैं अर्थात् गौतम गणधर अति निर्मल केवलज्ञान प्राप्त करूँगा और कर्मघाती गणधर सुधर्म सहित इसी देवोंको सन्तुष्ट करनेवाले राजगृह नगर में आऊँगा ॥१॥ २ स्वामी विवाह व गहमें चोर प्रवेश P गौतम गणधर कहते हैं कि है श्रेणिक, तुम्हारे पुत्र कुणिक को मैं संबोधित करूँगा और वह श्रुतज्ञान पाकर आनन्दित होगा । उसी समय जम्बूस्वामी भी वहाँ आवेगा और वह भक्तिपूर्वक अरहन्तदीक्षा माँगेगा 1 किन्तु उसके बन्धुजन उसे बलपूर्वक रोकेंगे और वह अपने नगर में सप्त भूमिप्रासाद अर्थात् सतखण्डे महलमें रहने लगेगा। फिर उसके बिवाहकी तैयारी की जायगी। किन्तु वह अपने मनमें उसकी अवहेलना करेगा तथापि सागरदत्त सेठकी पुत्री पद्मावती, देवगजगामिनी सुलक्षणा, पद्मश्री, सुन्दरी कनकश्री, विनयश्री, धनश्री भवन के मध्य माणिक्य प्रदीपके समान माणिक्यवती और रत्नोंके चूर्णसे निर्मित रंगावलीके समान सुन्दरी रंगावलि, इनके साथ वह वरके रूपमें नये कंकन बांधे अपना हाथ उठाकर उन वधुओंका पाणिग्रहण करेगा। उसी रात्रि जब उसकी माता चुपचाप देख रही थी, तभी उनके घरमें एक चोरने प्रवेश किया। यह चोर यथार्थंतः उसी समय सुरम्यदेशको राजधानी पोदनपुरके विद्युत्य नामक राजाका पुत्र था। उसका नाम विद्युच्चर था और वह सुभटोंका अग्रणी था। वह शत्रुरूपी पर्वतों के लिए बज्रसमान दिग्गज किसी कारणसे क्रुद्ध हो गया और अकस्मात् अपना नगर छोड़कर चला गया। उसने अदृश्य होने, कपाट खोलने तथा लोगोंकी बुद्धिको विनष्ट करनेकी विद्या ७
SR No.090534
Book TitleVeerjinindachariu
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorHiralal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1974
Total Pages212
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size3 MB
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